मुफ्तखोरी नहीं उन्हें उनका स्वाभिमान दीजिये

चुनावों में दिखी नाराजगी के बाद केंद्र सरकार जल्द ही किसानों के लिए कर्ज माफी का एक नया पैकेज लेकर आ सकती है। मीडिया में छप रही ख़बरों के अनुसार कर्ज माफी का यह पैकेज 4 लाख करोड़ तक का हो सकता है। वैसे तो यह पैकेज कोई स्थाई समाधान नहीं हैं, लेकिन लगता तो यही कि मौजूदा केंद्र सरकार भी किसानों के लिए किसी स्थाई समाधान में दिलचस्पी नहीं ले रही है। किसानों की आय को दुगना करने की कुछ घोषणाएँ अवश्य हुईं लेकिन उन पर काम कितना हुआ आज तक नहीं पता चला। देखने से तो यही लगता है कि मौजूदा सरकार ने भी खेती किसानी का प्रबंधन उसी तरह किया है जैसे पहले आने वाली सरकारों ने किया था।

दरअसल आजादी के बाद से आज तक देखा जाय तो किसी भी सरकार ने खेती किसानी पर किसी कारगर नीति को नहीं अपनाया और यही वजह रही कि दिन ब दिन खेती एक घाटे का व्यापार होता चला गया। हरित क्रान्ति के आलावा खेती किसानी पर कोई कारगर योजना याद भी नहीं आती है, हरित क्रांति 1966-67 में पारम्परिक कृषि को आधुनिक तकनीकि द्वारा प्रतिस्थापित किए जाने के रूप में सामने आई, थोड़े बहुत बदलाव इससे हुए लेकिन हरित क्रांति का फायदा भी मात्र बड़ी जोत वाले किसान ही उठा सके और केवल कुछ राज्यों में इसके फायदे नजर आ सके।

बाद में सभी पार्टियों और राजनेताओं ने कर्ज माफी का एक शार्ट काट अपना लिया और वही किसानों को मिलता रहा और वे इसके ही आदती भी हो गए। इस दौरान सभी पार्टियां किसानों के खिलाफ तो नहीं रहीं लेकिन किसानों के साथ भी नहीं रहीं क्योंकि किसी ने भी कोई कारगर कृषि नीति या कार्यक्रम किसानों को नहीं दिया। किसी भी उद्योग या उद्यम को आगे बढ़ने के लिए मूलभूत ढाँचे की आवश्यकता होती है और उसके बिना उद्यम का सफल होना संभव नहीं है। खेती भी एक उद्योग है और इसके लिए पर्याप्त मूलभूत ढाँचे की आवश्यकता है। खेती के लिए परामर्श, तकनीकि, बीज, सिंचाई, विपणन प्रणाली का ढाँचा खड़ा करके देना सरकार का ही काम है और इसे कोई भी पार्टी अकेले नहीं कर सकती। इसके लिए सभी राजनीतिक दलों को एक साथ मिलकर नीति का निर्माण करना पड़ेगा, कम से कम इस मामले में सभी दलों को मिलकर कार्यक्रमों का निर्माण करना पड़ेगा, वरना एक की बनाई नीति को कल दूसरे सरकार समाप्त कर देगी और पिछला हुआ खर्च भी बेकार हो जाएगा।

अभी चुनाव परिणामों के बाद हमारे एक मित्र ने ग्रामीण भारत पर एक कमेंट किया था उन्हें तो बस “फ्रीबीज” चाहिए, आप गलत हैं जनाब इस देश के गावों में बसने वाला किसान भी उतना स्वाभिमानी है जितना कि आप शहरों में बसने वाले लोग और रही बात फ्रीबीज की तो आप शहर में रहने वाले लोगों को कितनी फ्रीबीज मिलती हैं न कभी उन पर भी गौर कीजिये। क्या आप जिस मूल्य पर शहरों में पानी, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य, पेट्रोल, डीज़ल, गैस, सड़क, परिवहन सेवाओं का इस्तेमाल कर रहे हैं इनका मूल्य मात्र इतना ही है जो आप दे रहे हैं। नहीं जनाब इसकी कॉस्ट उससे कहीं ज्यादा जो कि आप दे रहे हैं। जिस प्रकार आप इन सबके हकदार हैं उसी प्रकार इस देश का किसान – इस देश गाँव भी इन सभी सुविधाओं का हकदार है जो कि उसको नहीं मिल रहा है।

जिस प्रकार शहरों का विकास, विकास है, उसी प्रकार गावों का विकास भी विकास ही है, उसके मायने कुछ और नहीं है, कागजों पर बिजली पहुँच जाने, टॉयलेट बन जाने से ही जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती है, उनके लिए असल रहने योग्य और काम करने योग्य गाँव का निर्माण करके देना भी हमारी जिम्मेदारी है। जैसे बड़े उद्यमों को चलाने के लिए मूलभूत ढाँचा खड़ा करके दिया जाता है, स्पेशल इकनोमिक जोन बना के दिए जाते हैं, वैसे ही खेती किसानी के लिए उन्हें भी सारी सुविधाएँ मुहैया करना सरकारों की राजनेताओं की जिम्मेदारी है और वो जितना इससे भागते रहेंगे उतना ही इस जाल में फँसते चले जायेंगे। खेती किसानी के विकास के लिए कर्ज माफी नहीं दिल साफ़ करके सब लोग एक साथ बैठिये और असल काम कीजिये।

उनसे आय दुगना करने के हवा हवाई वायदे मत कीजिये असल स्थिति पर गौर कीजिये और फिर नीति का निर्माण कीजिये। पिछले चार सालों में किसानों की आय बढ़ी नहीं बल्कि घटी है, खेती से होने वाली पैदावार सितंबर माह में खत्म हुई तिमाही में 5.3 फीसदी से घटकर केवल 3.8 फीसदी रह गई। उपज कमजोर होने के साथ ही किसानों की आय पर भी प्रभाव पड़ा है। किसानों की आय में गिरावट होने से गांव-देहातों में उपभोक्ता वस्तुओं की बिक्री भी काफी कम हो गई है।

कम से कम खेती किसानी और गाँवों के नाम पर राजनीति मत कीजिये हम सब इन्हीं गाँवों से निकलकर आये हैं और फिर कभी लौटकर वहां नहीं गए हैं इस स्थिति से हमें उबरना होगा, उनके लिए भी हमें सोचना होगा। सभी पार्टियों को मिल बैठकर इसके लिए सोचना होगा, उनमें फ्रीबीज यानी मुफ्तखोरी की आदत नहीं उनमें स्वाभिमान का निर्माण करना होगा। फ्रीबीज की आदत तो हमारे देश की छुद्र राजनीति की ही देन है कभी आरक्षण दिया, कभी लैपटॉप बाँटे, कहीं फ्री वाई फाई, तो कहीं साड़ियाँ और तो चुनाव के समय नोटों के बण्डल और शराब तक बँटती रही है। लेकिन बहुत हो गया अब बस काम से काम अब तो स्वाभिमान बाँटिये क्योंकि अब आप जो कुछ भी कर रहे हैं वह दिख रहा है और साफ़ साफ़ दिख रहा है, जिसे आप अब छुपा भी नहीं सकते।

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