वर्कइंडिया ! स्टाफ हायर करने का नया तरीका

पिछले कई दिनों से हायरिंग से सम्बन्धित कुछ विज्ञापन फेसबुक पर लगातार देख रहा था, ये विज्ञापन कुछ अलग से थे, ये विज्ञापन स्थानीय अथवा क्षेत्रीय एवं हिंदी भाषाओं में थे, जबकि अधिकतर ऐसे विज्ञापन अंगरेजी भाषा में ही हमने देखे थे. जिज्ञासावश इस बारे में और जानने की कोशिश की, अपने गूगल महाराज की मदद ली और इन विज्ञापनों के माध्यम से कम्पनी की वेबसाइट को भी खंगाला. इन विज्ञापनों में एक बात और अलग थी कि ये विज्ञापन अधिकतर साधारण ओपनिंग्स अर्थात ब्लू एवं ग्रे कॉलर जॉब्स से ही सम्बंधित थीं, जैसे ड्राइवर, पिऊन, ऑफिस असिस्टेंट, एकाउंट्स असिस्टेंट, टेली कॉलर्स इत्यादि. इस वेबसाइट पर जाकर देखा तो एक बात और बहुत क्लिक की, सलाहकारों और जॉब कंसल्टंसीस को इस वेबसाइट पर पंजीकरण की एकदम अनुमति नहीं थी, यह लाल अक्षरों में लिखी गई चेतावनी मुझे “जल में रहकर मगर से बैर” जैसी लगी. दरअसल इस विषय में बाद में कम्पनी से पता चला कि जॉब कंसल्टेंट्स अक्सर कैंडिडेट्स से भी नौकरी दिलाने के लिए चार्ज करते हैं और कैंडिडेट्स से इस प्रकार चार्ज करना वर्कइंडिया कम्पनी की पॉलिसी के खिलाफ है.

यह सब जानकारी हासिल करते हुए पता चला कि यह मुम्बई में स्थित एक स्टार्टअप है “वर्कइंडिया“, जिसे भवन्स कैंपस के इन्क्यूबेशन सेंटर से संचालित किया जा रहा है. दरअसल यह एसपीआईटी इन्क्यूबेशन सेंटर द्वारा समर्थित 18-20 स्टार्टअप्स में से एक है. मई 2015 में वर्कइंडिया स्टार्टअप की स्थापना कुणाल पाटिल, नीलेश डुंगरवाल एवं मोइज़ अर्सीवाला ने मिलकर की. जल्द ही जतिन जखारिया, सौमिल राव, लोकेश तिवारी और क्षितिज नागवेकर भी वर्कइंडिया स्टार्टअप परियोजना से कोफॉउंडर्स के रूप में जुड़े और फिर कारवाँ बढ़ता गया. ये सभी संस्थापक सदस्य अलग क्षेत्रों में काम कर रहे थे और इनमें से कुछ काफी सफल और अनुभवी भी रह चुके थे. वर्कइंडिया के संस्थापक सदस्यों में कोई आईआईटी बॉम्बे से है, कोई यूएस, न्यूयॉर्क में 5-6 साल काम करके लौटा है, कोई सीनियर आईटी इंजीनियर है, तो कोई बड़े विदेशी बैंक में काम करके लौटा है. इन सभी को कुणाल ने एक छत के नीचे इकठ्ठा किया और शुरू हुई एक स्टार्टअप यात्रा वर्कइंडिया के साथ भारतवर्ष में युवाओं को रोजगार दिलाने की खातिर.

इस कहानी को कवर करने के लिए SME SAMADHAN की टीम खुद भवन्स कैंपस पहुँची. इन्क्यूबेशन सेंटर में घुसते ही हवा में कुछ युवा जोश सा महसूस हुआ.  कोवर्किंग में कार्य प्रगति पर नजर आ रहा था. कहीं कॉल सेंटर चल रहा था, कहीं मीटिंग्स हो रही थीं, कहीं बैक ऑफिस और दूसरी चीजें, देखने से यह कोवर्किंग किसी कॉर्पोरेट ऑफिस जैसा नजर आ रहा था, लेकिन यहाँ एक ही ऑफिस में कई टीमें और कई कम्पनीज एक साथ काम कर रही थीं. कॉर्पोरेट ऑफिस से लुक के बावजूद कई चीजें यहाँ अलहदा थीं, रात के नौ बजे भी सुबह नौ बजे वाला जुनून और कपड़े लत्तों (ड्रेस कोड) की जगह काम पर ज्यादा ध्यान अथवा फोकस दिख रहा था.

वर्कइंडिया टीम के सभी सदस्यों से मुलाकात हुई और बातचीत शुरू हुई कुणाल पाटिल से. कुणाल न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी से एमबीए हैं और यूएस स्थित मॉनिटर ग्रुप एवं मेरिल लिंच इन्वेस्टमेंट बैंकिंग के लिए न्यूयॉर्क और मुम्बई दोनों जगहों पर काम कर चुके हैं, वे एक उद्देश्य पूर्ण जीवन जीने में विश्वास रखते हैं. वो कहते हैं, “मैं अर्थपूर्ण रूप में जीवन को छूना चाहता हूँ और वर्कइंडिया मेरे इसी जीवन दर्शन का विस्तार है. 2014 के आस पास देश के जनसंख्यिकीय आंकड़ों के पैटर्न में अधिकतम युवाओं का होना एक अवसर जैसा नजर आने लगा, नई सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी भारत के इस बदलते सामाजिक समीकरण के प्रति संजीदा से नजर आये और हमें भी इस बढ़ती युवा शक्ति के लिए रोजगार एक समस्या और समस्या के समाधान में एक अवसर सा दिखा. इस यूवा आबो हवा में स्टार्टअप्स जन्म ले रहे थे और उन्हें समाधानों के लिए काम करने की प्रेरणा भी मिल रही थी और यहीं से वर्कइंडिया की परियोजना भी शुरू हुई.”

प्रौद्योगिकी और अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी ही समस्या के समाधानों तक पहुँचने के रास्ते थे, अतः वर्कइंडिया ने भी अत्याधुनिक तकनीक पर ध्यान केंद्रित किया और ब्लू एवं ग्रे सेगमेंट में हायरिंग के लिए नियोक्ताओं एवं कर्मचारियों के बीच मौजूद महत्वपूर्ण जानकारी की असमानता को समाप्त करने का बीड़ा उठाया. कुणाल बताते हैं, कि इस सेगमेंट के आंकड़ों की बात की जाय तो भारत में विद्यमान कुल 250 मिलियन गैर-कृषि कार्यबल में से 230 मिलियन की नुमाइंदगी ब्लू एवं ग्रे सेगमेंट का यह रोजगार बाजार ही करता है. वर्कइंडिया इस 230 मिलियन आबादी के जीवन में क्रांतिकारी बदलाव लाना चाहता है क्योंकि ये अकेले नहीं हैं, इनके साथ इनके परिवार भी जुड़े हुए हैं और यदि परिवार के सदस्यों की संख्या भी साथ में जोड़ दी जाय तो यह आंकड़ा कितना बढ़ जाएगा उसका सिर्फ अंदाजा ही लगाया जा सकता है. तो इतनी बड़ी जनसंख्या को ध्यान में रख कर काम करते हुए यह सब कुछ एक मिशन सा बन गया. कर्मचारियों को अपनी सुविधा के अनुरूप अपने ही क्षेत्र में काम मिल सके और नियोक्ता को बिना संघर्ष के उपयुक्त कर्मचारी मिल सके यही इस मिशन का लक्ष्य है.”

इस मिशन को तकनीकि जामा पहनाने वाले नीलेश डुंगरवाल तकनीकि के विषय में बात करते हुए बताते हैं, “वर्कइंडिया के इस मिशन को एक विज़न देने के लिए वर्कइंडिया की हमारी प्रौद्योगिकी टीम ने एक जटिल भू-स्थिति (जिओ-पोजिशनिंग) से युक्त मोबाइल उत्पाद (ऐप्प)  का निर्माण किया जो इस्तेमाल करने में एक दम आसान हो और जिसे पढ़ा लिखा से लेकर कम पढ़ा लिखा कर्मचारी एक दम आसानी से इस्तेमाल कर सके. वर्कइंडिया का यह ऐप्प कर्मचारियों को उन नौकरियों की जानकारी प्रदान करता है जो उनके लिए सर्वाधिक उपयुक्त हो, वर्कइंडिया ऐप्प कर्मचारियों को  समाधान उनके स्थान या उनके कौशल अथवा स्किलसेट तथा अन्य महत्वपूर्ण पैरामीटरस को ध्यान में रखते हुए प्रदान करता है. बहुत ही कम समय में वर्कइंडिया की लोकप्रियता हमारी अत्याधुनिक तकनीकि की सफलता को खुद ही बयान करती है. मौजूदा समय में हमारे वर्कइंडिया ऐप्प पर रोजाना लगभग 1 लाख लोग जॉब सर्च कर रहे हैं, जबकि प्लेस्टोर पर वर्कइंडिया ऐप्प की रेटिंग 4.2 है.”

तकनीकि की बातें चल ही रही थीं कि कुणाल पुनः हमारा ध्यान “वर्कइंडिया की रोजगार यात्रा की और खीचते हैं. वर्कइंडिया अब ब्यूटिशियन,  कुक, कॉउंसलर, डिलीवरी, ऑफिस बॉय, पिऊन, मेड, ड्राइवर, सिक्योरिटी गॉर्ड, टीचर, ट्रेनर, कंटेंट राइटिंग, रिसेप्शनिस्ट, एचआर, एकाउंट्स, बैक ऑफिस, रिटेल, डीटीपी, इंजीनियर, फील्ड सेल्स, ग्राफ़िक डिज़ाइनर, हार्डवेयर इंजीनियर, प्रोग्रामर,  हॉस्पिटैलिटी, हाउस कीपिंग, लैब तकनीशियन, तकनीशियन, टेलीकॉलिंग, बिज़नेस डेवलपमेंट, मार्केटिंग, ऑनलाइन मार्केटिंग, मेडिकल, नर्स, वार्ड बॉय जैसी कैटेगरीज में लोगों को रोजगार मुहैय्या करा रहा है. मुंबई से शुरू हुआ यह सफर आज पुणे, नागपुर, सूरत, अहमदाबाद, वड़ोदरा, बेंगलुरु, चेन्नई, कोयंबटूर, त्रिवेंद्रम, कोच्ची, हैदराबाद, दिल्ली, चंडीगढ़, इंदौर, जयपुर, लखनऊ से होते हुए कोलकता तक पहुँच गया है. ऐसा नहीं है कि हमारी उपस्थिति मात्र महानगरों एवं बड़े शहरों तक ही सीमित है, हम टियर 2 टियर 3 शहरों अहमदनगर, अकोला, अमरावती, औरंगाबाद, कोल्हापुर, नाशिक, लातूर, सोलापुर, नांदेड़, धुले, जलगांव इत्यादि में भी धीरे धीरे स्ट्रैटेजीकली अपने पाँव पसार रहे हैं. सम्पूर्ण भारत के छोटे बड़े सभी शहरों पर हम काम कर रहे हैं, देखते हैं वर्कइंडिया की इस रोजगार यात्रा को हम कहाँ कहाँ तक लेकर पहुँचते हैं, वैसे लक्ष्य तो सम्पूर्ण भारत का है.”

तो यह रहा वर्कइंडिया की रोजगार यात्रा का सफर आपको कैसा लगा हमें अवश्य लिखें. वैसे यह भी ध्यान रखें कि अभी तो यह सफर बस शुरू ही हुआ है, असल पिक्चर तो अभी बाकी है।

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