कहानी फ़्लिपकार्ट वाले बिनी बंसल की

  • कामयाबी से इस्तीफ़े तक

कमलेश
बीबीसी संवाददाता

(बीबीसी हिंदी से साभार)

फ़्लिपकार्ट के सह-संस्थापक बिनी बंसल ने शायद ही सोचा होगा कि कभी उन्हें इस तरह अपनी कंपनी छोड़ना पड़ेगी.

बिनी बंसल और फ़्लिपकार्ट, ये दो नाम अब तक कामयाबी की एक शानदार कहानी थे लेकिन अब इसमें आरोप और इस्तीफ़े का स्याह पहलू भी जुड़ गया है.

भारत की सबसे बड़ी ऑनलाइन रिटेलर कंपनी फ़्लिपकार्ट के सीईओ और सह-संस्थापक बिनी बंसल ने ‘व्यक्तिगत दुर्व्यवहार’ के आरोपों के चलते इस्तीफ़ा दे दिया है.

फ़्लिपकार्ट को पिछले साल ही वॉलमार्ट ने ख़रीद लिया था. कंपनी के सह संस्थापक सचिन बंसल अपनी हिस्सेदारी बेचकर पहले ही इस्तीफ़ा दे चुके हैं लेकिन 37 वर्षीय बिनी पद पर बने हुए थे.

कंपनी का कहना है कि बिनी के ख़िलाफ़ शिकायत की अंदरूनी जांच में आरोपों के पक्ष में सबूत तो नहीं मिले हैं लेकिन इस मामले पर बिनी बंसल ने पारदर्शिता नहीं दिखाई है.

हालांकि, बिनी बंसल ने कंपनी के कर्मचारियों को लिखे एक मेल में इन आरोपों से इनकार किया है. उन्होंने लिखा, ”इन आरोपों से मैं हैरान हूं और दृढ़ता से इन्हें ख़ारिज करता हूं. ये मेरे परिवार और मेरे लिए चुनौती भरा समय है. इन हालात को देखते हुए मैं कंपनी के चेयरमैन और ग्रुप सीईओ के पद से इस्तीफा देना ही सही समझता हूं.”

फिलहाल दोनों बंसल अब फ़्लिपकार्ट से जुदा हो चुके हैं. लेकिन, वो कहानी कम हैरतअंगेज़ नहीं है, जब शून्य से शुरुआत करके बिनी और सचिन बंसल ने फ़्लिपकार्ट को यहां तक पहुंचाया था.

भारतीय स्टार्टअप की दुनिया में जय-वीरू कहलाने वाले बिनी बंसल और सचिन बंसल कुछ ही सालों में कॉलेजमेट से सहकर्मी और फिर बिजनेस पार्टनर बन गए.

बिनी बंसल चंडीगढ़ के रहने वाले हैं. उनके पिता एक बैंक के चीफ़ मैनेजर रहे हैं और मां भी किसी सरकारी नौकरी में हैं. उन्होंने आईआईटी, दिल्ली से कंप्यूटर साइंस की पढ़ाई की है.

कॉलेज से निकले किसी भी नौजवान की तरह वो एक अदद नौकरी चाहते थे जो पढ़ाई को ‘सफल’ बना सके.

उन्होंने गूगल में भी नौकरी की कोशिश की लेकिन कामयाब नहीं हुए. गूगल से उन्हें दो बार खाली हाथ लौटना पड़ा.

फिर भी उनकी कोशिशें काम आईं और एक बड़ी ऑनलाइन रिटेलर कंपनी अमेज़ॉन में उन्हें नौकरी मिल गई. अमेज़ॉन में ही वह अपने पुराने दोस्त सचिन बंसल से मिले. यहां ध्यान रखना ज़रूरी है कि बिनी और सचिन दोस्त हैं, भाई नहीं.

सचिन बंसल भी आईआईटी, दिल्ली में कंप्यूटर साइंस के स्टूडेंट रहे हैं और उन्होंने बिनी से एक बैच पहले एडमिशन लिया था.

अमेज़ॉन में साथ काम करते हुए दोनों को ख़ुद के स्टार्टअप का ख़याल आया. दोनों में से किसी को कारोबार का अनुभव नहीं था लेकिन उनके पास एक आइडिया जरूर था.

दोनों ने कुछ हिम्मत दिखाई और नौकरी छोड़ दी. पहले सचिन बंसल और फिर कुछ समय बाद बिनी बंसल अमेज़ॉन से अलग हो गए. बिनी ने सिर्फ़ नौ महीने ही अमेज़ॉन में नौकरी की.

दोनों को ऑनलाइन रिटेल का अनुभव था लेकिन भारत में ये आइडिया पूरी तरह पांव नहीं पसार सका था. ऑनलाइन रिटेलिंग अपने शुरुआती दौर में थी और इस क्षेत्र में दूसरी कंपनियां भी काम कर रही थीं.

बिनी और सचिन बंसल ने साल 2007 में फ़्लिपकार्ट की शुरुआत की और पहले सिर्फ़ किताबें बेचने का फ़ैसला किया. दोनों ने 4 लाख रुपये पूंजी के साथ कंपनी शुरू की. शुरुआती काम था किताबों की होम डिलिवरी. वो मालिक भी ख़ुद थे और कर्मचारी भी.

बिनी और सचिन बंसल ख़ुद किताबें ख़रीदते और वेबसाइट पर आए ऑडर्स पर अपने स्कूटर से डिलीवरी करते. कंपनी के पास प्रचार के भी खास साधन नहीं थे इसलिए दोनों बुक स्टोर्स के पास जाकर अपनी कंपनी के पर्चे भी दिया करते थे.

​धीरे-धीरे कंपनी ने कदम बढ़ाने शुरू किए. इसके बाद दोनों ने साल 2008 में बैंगलुरू में एक फ्लैट और दो कंप्यूटर सिस्टम के साथ अपना ऑफिस खोला. अब उन्हें हर दिन करीब 100 ऑर्डर मिलने लगे.

इसके बाद फ़्लिपकार्ट ने बेंगलुरू में सोशल बुक डिस्कवरी सर्विस ‘वीरीड’ और ‘लुलु डॉटकॉम’ को ख़रीद लिया.

साल 2011 में फ़्लिपकार्ट ने कई और कंपनियां खरीदीं जिनमें बॉलीवुड पोर्टल चकपक की डिजिटल कंटेट लाइब्रेरी भी शामिल थी.

कैश ऑन डिलिवरी ने किया कमाल

ऑनलाइन सामान लेते वक़्त कई लोगों के मन में कई तरह की आशंकाएं थीं. सामान की गुणवत्ता से लेकर उसकी डिलिवरी की टाइमिंग तक. ये सब सोचते हुए लोग ऑनलाइन पेमेंट करने की बजाय कैश ऑन डिलिवरी का सुरक्षित विकल्प अपनाते हैं.

लेकिन, फ़्लिपकार्ट ने इसी मुश्किल को मौक़े में बदल लिया. बिनी और सचिन बंसल पहली बार भारत में कैश ऑन डिलिवरी का विकल्प लेकर आए. इससे लोगों को अपना पैसा सुरक्षित महसूस हुआ और कंपनी पर भरोसा भी बढ़ता गया.

​साल 2008-09 में फ़्लिपकार्ट ने 4 करोड़ रुपये की बिक्री कर दी. इसके बाद निवेशक भी इस कंपनी की ओर आकर्षित हुए.

बिनी और सचिन बंसल मानते हैं कि ऑनलाइन ​रिटेल में कस्टमर सर्विस बहुत बड़ा फैक्टर है. वरिष्ठ पत्रकार शेखर गुप्ता को दिए गए इंटरव्यू में सचिन बंसल और बिनी बंसल ने कहा था कि वो कंस्टमर सर्विस टीम के साथ दो-दो दिन बिताते हैं और उनकी सुझावों व शिकायतों पर काम करते हैं.

वहीं, कंपनी ने सर्च इंजन ऑप्टिमाइज़ेशन पर भी काम किया. इसका मतलब ये है कि जब कोई किताब ख़रीदने के लिए उसका नाम किसी सर्च इंजन में डालता तो सबसे ऊपर फ़्लिपकार्ट का नाम आता. इस कारण कंपनी को विज्ञापन भी मिलने लगे.

कामयाबी, फिर दूसरी कंपनियों से चुनौती
निवेश हर नई कंपनी के लिए बड़ी ज़रूरत होती है. शुरुआती दौर फ़्लिपकार्ट के लिए भी मुश्किलों भरा रहा. आगे चलकर कंपनी में साल 2009 में ऐसेल इंडिया ने 10 लाख डॉलर का निवेश किया जो साल 2010 में एक करोड़ डॉलर पहुंच गया.

इसके बाद 2011 में फ़्लिपकार्ट को एक और बड़ा निवेशक टाइगर ग्लोब मिला जिसने दो करोड़ डॉलर का निवेश किया. ऐसेल इंडिया और टाइगर ग्लोब लगातार फ़्लिपकार्ट के साथ जुड़े रहे.

वेबसाइट चल निकली तो किताबों के अलावा फर्नीचर, कपड़े, असेसरीज, इलेक्ट्रॉनिक्स और गैजेट जैसे सामान भी बेचे जाने लगे.

ई-कॉमर्स का बाज़ार बढ़ने के साथ फ़्लिपकार्ट को दूसरी कंपनियों से चुनौती मिलने लगी थी. इसी को देखते हुए उन्होंने कुछ ऑनलाइन रिटेल वेबसाइट को ख़रीदा.

फ़्लिपकार्ट ने 2014 में मिंत्रा और 2015 में जबॉन्ग को ख़रीद लिया. कंपनी स्नैपडील को भी ख़रीदना चाहती थी लेकिन बात नहीं बन पाई.

लेकिन, मार्च 2018 में ही वॉलमार्ट ने ​फ़्लिपकार्ट की 77 प्रतिशत हिस्सेदारी 16 अरब डॉलर में ख़रीद ली.

दरअसल, कंपनी को अमेज़ॉन के भारत में आने के साथ ही चुनौती मिलनी शुरू हो गई थी. इस प्रतिस्पर्धा में उन्हें काफ़ी निवेश करना पड़ रहा था.

हालांकि, वॉलमार्ट के साथ अमेज़ॉन भी ​फ़्लिपकार्ट को ख़रीदने की रेस में शामिल थी लेकिन वॉलमार्ट आगे रही.

मार्च 2018 को ख़त्म हुए वित्तीय वर्ष में कंपनी ने 7.5 अरब डॉलर की बिक्री की थी. पिछले साल के मुक़बाले उसकी बिक्री में 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई थी.

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