बनारस

शहर छोटे हों या बड़े अपना महत्त्व रखते हैं. प्रधानमंत्री मोदी की मौजूदा कर्मस्थली बनारस में पिछले कुछ दिन रहा. एक अलग फक्कड़पन इस शहर के रहन सहन में पाया, हर आदमी मस्त एक दूसरे से चुहल करते लोग, बिना बात बिना पहचान के भी एक दूसरे से बतियाते लोग….संचार का एक अनवरत सा माहौल….हाल ही में बनारस की एक कवियित्री एवं लेखिका मित्र छाया शुक्ला दीदी ने बड़े ही मन से बनारस के सन्दर्भ में अपने शब्दों से उकेरा है…..वैसे उद्यमिता के इस मंच पर साहित्य तो नहीं ही लिखा जाता है….फिर भी हमारे शहरों की समझ अपनी भीतर लाने के लिए आप भी पढ़ें छाया दीदी की कविता बनारस

बनारस

ज़रा पौ फटे तो सँभलता बनारस ।
शिवा शिव के संग संग टहलता बनारस ।

कोई जाम लेकर कोई भाँग लेकर
लँगोटी ओ गमछे में चलता बनारस ।

कभी ताल ठोंके कभी खैनी मलमल
गली में गली से निकलता बनारस ।

पराया हो दुख या के अपना किसी का
जो देखे ये पीड़ा पिघलता बनारस ।

हरिक घाट पर इक नई सी है दुनिया
घड़ी घंट बमबम में फलता बनारस ।

नहीं साध इसको बहुत जगमगाए
लगा भस्म तन पर उछलता बनारस ।

समय दर समय ये क़दम दर क़दम पर
सँवारे स्वयं को बदलता बनारस ।

शिवा की हो “छाया” कृपा भोले की हो
मेरी सांस में बस मचलता बनारस ।
–छाया

छाया शुक्ला

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