कंपनी कानून-2013 के दंड विषयक प्रावधानों की समीक्षा समिति ने अपनी अंतिम रिपोर्ट सौंपी

  • कंपनी कानून-2013 के दंड विषयक प्रावधानों की समीक्षा समिति ने अपनी अंतिम रिपोर्ट श्री अरूण जेटली को सौंपी
  • विशेष अदालतों को नियमित अपराधों के फैसले सुनाने से राहत देने के लिए कॉरपोरेट अपराधों की नये सिरे से समीक्षा; एनसीएलटी को मुक्त करने की सिफारिश की
  • कॉरपोरेट अनुपालन और कॉरपोरेट शासन प्रणाली से जुड़ी अनेक सिफारिशें की

कंपनी कानून-2013 और संबद्ध मामलों के अंतर्गत अपराधों से निपटने के लिए वर्तमान ढांचे की समीक्षा के लिए सरकार द्वारा जुलाई, 2018 में गठित समिति ने कॉरपोरेट अनुपालन को बेहतर तरीके से आगे बढ़ाने की सिफारिश करते हुए आज यहां अपनी रिपोर्ट सौंपी। रिपोर्ट समिति की अध्‍यक्षता कर रहे कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय में सचिव श्री इंजेती श्रीनिवास ने केन्द्रीय वित्त एवं कॉरपोरेट मामलों के मंत्री श्री अरूण जेटली को सौंपी।

समिति ने सभी दंड विषयक प्रावधानों का विस्तृत विश्लेषण किया, जिन्हें अपराधों की प्रकृति के आधार पर उस समय आठ श्रेणियों में बांट दिया गया था। समिति ने सिफारिश की कि छह श्रेणियों को शामिल करते हुए गंभीर अपराधों के लिए वर्तमान कठोर कानून जारी रहना चाहिए, जबकि दो श्रेणियों के अंतर्गत आने वाली तकनीकी अथवा प्रक्रियात्मक खामियों के लिए निर्णय की आंतरिक प्रक्रिया होनी चाहिए। समिति का मानना था कि इससे ईज ऑफ डूइंग बिजनेस और कॉरपोरेट के बेहतर अनुपालन को बढ़ावा देने के दोहरे मकसद को पूरा किया जा सकेगा। इससे विशेष अदालतों में दायर मुकदमों की संख्या भी कम होगी, जिससे बदले में गंभीर अपराधों का तेजी से निपटारा होगा और गंभीर अपराधियों के खिलाफ मामला दर्ज हो सकेगा। कॉरपोरेट धोखेबाजी से जुड़ा अनुच्छेद 447 उन मामलों पर लागू रहेगा, जहां धोखेबाजी पाई गई है।

रिपोर्ट में अन्य बातों के अलावा राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) को न्यायाधिकरण के समक्ष मौजूद शमनीय अपराधों की संख्या में पर्याप्त कटौती के जरिए मुक्त करने की सिफारिश की गई है। इसके अलावा रिपोर्ट में कॉरपोरेट शासन प्रणाली जैसे कि व्यवसाय शुरू करने की घोषणा, पंजीकृत कार्यालय का संरक्षण, जमाकर्ताओं के हितों की रक्षा, पंजीकरण और शुल्क प्रबंधन, हितकारी स्वामित्व की घोषणा और स्वतंत्र निदेशकों की स्वतंत्रता से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण बातों को शामिल किया गया है।

समिति की प्रमुख सिफारिशें इस प्रकार हैं:

(1)    नियमित अपराधों के मामले में निर्णय देने से विशेष अदालतों को छुटकारा दिलाने के लिए कॉरपोरेट अपराधों की नये सिरे से समीक्षा :

(क)   81 शमनीय अपराधों में से 16 को विशेष अदालतों के अधिकार क्षेत्र से हटाकर आंतरिक ई-निर्णय के लिए अपराधों की नई श्रेणियां बनाना, जहां अधिकृत निर्णय अधिकारी (कंपनियों के रजिस्ट्रार) चूककर्ता पर दंड लगा सकेंगे।

(ख)   शेष 65 शमनीय अपराध अपने संभावित दुरूपयोग के कारण विशेष अदालतों के अधिकार क्षेत्र में ही रहेंगे।

(ग)    इसी प्रकार गंभीर कॉरपोरेट अपराधों से जुड़े सभी अशमनीय अपराधों के संबंध में यथास्थिति बनाए रखने की सिफारिश की गई है।

(घ)    फैसलों का ई-निर्णय और ई-प्रकाशन करने के लिए पारदर्शी ऑनलाइन मंच तैयार करना।

(ड़)    दंड लगाने के समय पर चूक साबित करने के लिए सहवर्ती आदेश को अनिवार्य करना, ताकि बेहतर तरीके से पालन हो सके।

(2)    द्वारा एनसीएलटी को मुक्त करना

(क)   कंपनी कानून-2013 के अनुच्छेद 441 के अंतर्गत अपराधों की शमनीयता के लिए वित्तीय सीमाओं को बढ़ाने के साथ क्षेत्रीय निदेशक का अधिकार क्षेत्र बढ़ाकर;

(ख)   अनुच्छेद 2(41) के अंतर्गत कंपनी के वित्तीय वर्ष में बदलाव को मंजूरी देने की केन्द्र सरकार को अधिकार प्रदान करना; और कानून के अनुच्छेद 14 के अंतर्गत सार्वजनिक कंपनियों को निजी कंपनियों में बदलकर।

(3)    कॉरपोरेट अनुपालन और कॉरपोरेट शासन से जुड़ी सिफारिशें

(क)   ‘मुखौटा कंपनियों’ से बेहतर तरीके से निपटने के व्यावसायिक प्रावधानों की दोबारा शुरूआत की घोषणा करना;

(ख)   सार्वजनिक जमा के संबंध में बृहत्तर प्रकटीकरण, खासतौर से ऐसे लेन-देन के संबंध में जिसे कानून के अनुच्छेद 76 के अंतर्गत सार्वजनिक जमा की परिभाषा से मुक्त कर दिया गया है, ताकि जनहित के नुकसान को रोका जा सके।

(ग)    सृजन, सुधार और लेनदार के अधिकार से जुड़े दस्तावेजों को भरने के लिए समय-सीमा में भारी कटौती तथा जानकारी नहीं देने के लिए दंड विषयक कड़े प्रावधान।

(घ)    कंपनी के एक बार अनुच्छेद 90(7) के अंतर्गत महत्वपूर्ण लाभकारी स्वामित्व से जुड़े प्रतिबंध हासिल करने पर, ऐसे शेयरों के संबंध में जिनके स्वामित्व का पता नहीं है, ऐसे शेयरों को निवेशक शिक्षा और सर्वेक्षण कोष को हस्तांतरित कर दिए जाने चाहिए, यदि असली स्वामी ऐसे प्रतिबंधों का एक वर्ष के भीतर स्वामित्व का दावा नहीं करता।

(ड़)    पंजीकरण नहीं करने की प्रक्रिया के लिए पंजीकृत कार्यालय का रखरखाव नहीं करना।

(च)   स्वीकृति योग सीमा के बाहर निदेशक का पद रखना, ताकि ऐसे निदेशकों को अयोग्य ठहराया जा सके।

(छ)   स्वतंत्र निदेशकों की आय के प्रतिशत के मामले में मेहनताने की सीमा लागू करना ताकि किसी प्रकार के वित्तीय संबंधों से बचा जा सके, जो कंपनी के बोर्ड में उसकी स्वतंत्रता को नुकसान पहुंचा सकते हैं।

समिति के अन्य सदस्यों में कोटक महिन्द्रा बैंक के प्रबंध निदेशक श्री उदय कोटक, शरदूल अमरचंद मंगलदास एंड कंपनी के कार्यकारी अध्यक्ष श्री शरदूल एस. श्रौफ, एजेडबी एंड पार्टनर के संस्थापक प्रबंध सहयोगी श्री अजय बहल, जीएसए एसोसिएट्स के वरिष्ठ सहयोगी श्री अमरजीत चौपड़ा, फिक्की के पूर्व अध्यक्ष श्री सिद्धार्थ बिरला, स्मार्ट ग्रुप की साझेदार और कार्यकारी निदेशक सुश्री प्रीति मल्होत्रा और कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय में संयुक्त सचिव (समिति के सदस्य सचिव) श्री के.वी.आर. मूर्ति शामिल हैं।

स्रोत: पीआईबी.

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