अटल जी की कुछ यादगार उपलब्धियां

अटल जी के साथ ही एक युग की समाप्ति हो गई. वैसे तो उनका राजनीति में उनका एक लम्बा सफ़र रहा है. लेकिन उन्होंने अपने साढ़े छह साल के प्रधानमंत्रित्व काल में आर्थिक मोर्चे पर क्या उपलब्धियां हासिल की, यही हमारे इस मंच के लिए जानना महत्वपूर्ण है, अतः उनके द्वारा अर्थव्यवस्था एवं मूलभूत ढाँचे में किये गए सुधारों की हम यहाँ संक्षिप्त में चर्चा कर रहे हैं.

वर्ष 1991 में प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव एवं वित्त मंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व में देश में आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत हुई. अटल बिहारी वाजपेई जी इन आर्थिक सुधारों को सकारात्मक रूप से आगे बढ़ाया और 2004 में जब सत्ता का हस्तांतरण पुनः मनमोहन सिंह को सौंपा तब अर्थव्यवस्था एक बहुत ही सकारत्मक आकार में थी, उस समय देश का सकल घरेलू उत्पाद अर्थात जीडीपी की दर 8% से अधिक थी, मुद्रास्फीति 4% से कम थी और विदेशी मुद्रा भंडार भी काफी संपन्न अवस्था में था.

उन्होंने जो कदम उठाये उससे उनकी पार्टी भारतीय जनता पार्टी की छवि में आमूल चूल परिवर्तन आया और वे विकास के संवाहक और भारत को आर्थिक प्रगति की राह पर खड़ा करने वाले नेता के रूप में स्थापित हुए.

उनकी यादगार उपलब्धियों में प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना एक बहुत ही महत्वाकांक्षी योजना थी जिसने सड़कों के जाल को गाँव गाँव तक पहुँचाया. गोल्डेन क्वाड्रीलेटरल राजमार्ग योजना के तहत राजमार्ग नेटवर्क को चेन्नई, कोलकता, दिल्ली एवं मुंबई को जोड़ा. यह दोनों परियोजनाएं ही अत्यधिक सफलता रहीं और भारत के आर्थिक विकास में इन्होंने सकारत्मक योगदान दिया.    रूप से योगदान दिया. देश में सड़क एवं राजमार्गों के क्षेत्र में पहली बार इतने वृहद् स्तर पर काम हुआ जिसे आगे बढ़ाकर भविष्य की सरकारें भी विकास के एजेंडे पर कायम रह सकीं.

अटल जी के ही नेतृत्व में व्यापार एवं उद्योग को चलाने में सरकारी भूमिका को कम करने के लिए अलग विनिवेश मंत्रालय की स्थापना की गई. सार्वजानिक क्षेत्र की कम्पनियों बाल्को, हिंदुस्तान जिंक, आईपीसीएल, वीएसएनएल में विनिवेश उनके दौर की महत्वपूर्ण पहलें थीं.

राजकोषीय घाटे पर लगाम लगाने के लिए भी उनके समय में महत्वपूर्ण कदम उठाये गए. वित्तीय उत्तरदायित्व अधिनियम अर्थात फिस्कल रेस्पोंसिबिलिटी एक्ट प्रस्तावित कर राजकोषीय घाटे को कब्जे में करने का प्रयास किया गया. इसके साथ सार्वजनिक क्षेत्र की बचत को बढ़ावा दिया गया जिसने वित्त वर्ष 2000 में जीडीपी पर 0.8% से बढ़ते हुए 2005 तक 2.3% तक का सकरात्मक प्रभाव डाला.

उनके नेतृत्व में दूरसंचार क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन किये गए. नई दूरसंचार नीति में निश्चित लाइसेंस शुल्क के स्थान पर राजस्व-साझाकरण व्यवस्था को लागू किया गया. नीति निर्माण एवं सेवा प्रावधानों को अलग करने के लिए भारत संचार निगम लिमिटेड की स्थापना की गई. टेलिकॉम डिस्प्यूट सेटलमेंट अपीलेट ट्रिब्यूनल की स्थापना की गई जिसके साथ नियामक एवं विवाद निपटान की भूमिकाओं को अलग किया गया. अंतर्राष्ट्रीय संचार में विदेश संचार निगम लिमिटेड के एकाधिकार को समाप्त कर दिया गया.

स्रोत: विभिन्न प्रिंट अखबार.

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