सूक्ष्म, लघु और मझौले उद्यमों के लिए चुनौतियां और अवसर

पी एम मैथ्यू, निदेशक, लघु उद्यम और विकास संस्थान, कोचीन

भारतीय गणराज्य के संस्थापकों ने राष्ट्र निर्माण में लघु उद्यमों की समग्र भूमिका की परिकल्पना  की थी. समय के साथ यह क्षेत्र देश की विनिर्माण प्रणाली के  अत्यंत विविधिकृत आधार के रूप में उभरा है. आज जब वैश्विक अर्थव्यवस्था तेज़ी से बदल रही है जिसमें विघ्नकारी प्रौद्योगिकी का एकाधिकार होता जा रहा है, ऐसे में भारत में सूक्ष्म, लघु और मझौले उद्यमों की भूमिका के बारे में अधिक व्यापक और वास्तविक समझ होनी चाहिए. चूंकि उद्यमिता की मूल भावना सूक्ष्म, लघु और मझौले उद्यमों में निहित है. उद्यमिता अक्सर ज़मीनी स्तर पर अंकुरित होती है और  लोगों की रोज़गार आकांक्षाओं को साकार करती है. इन आकांक्षाओं को वैज्ञानिक तौर पर समझना और जमीनी स्तर पर उत्पन्न इस उमंग को प्रोत्साहित करना जरूरी है. इसलिए सूक्ष्म, लघु और मझौले उद्यमों के बारे में कोई भी चर्चा, आमतौर पर आर्थिक वृद्धि और विशेष रूप से रोजग़ार संवर्धन के एजेंडा के अंग के रूप में ही किए जाने की ज़रूरत है.

वैश्विक निवेश और उद्यमिता का मौजूदा परिदृश्य

किसी भी देश में लोक नीति पर वैश्विक घटनाओं का असर सार्वजनिक कार्यक्रमों जितना ही रहता है. भारत में आज नीति बनाते समय इस उभरते परिदृश्य को समझना बेहद ज़रूरी है. आज उभरते वैश्विक व्यापार मॉडल में बाहर स्थापित कंपनियों के  मूल देश में वापस आने (रीशोरिंग), अत: क्षेत्रीय व्यापार और हबोनॉमिक्स (गढ़-अर्थशास्त्र) का मिश्रण है. गूगल , एप्पल, फेसबुक और एमेज़ॉन जैसी बड़ी ज्ञान कंपनियों ने प्रौद्योगिकी की एक लहर और स्पर्धा का आधार तैयार किया है जो अगली औद्योगिक क्रांति के उद्धव का संकेत है.

2017 में हमने देखा कि कारोबार के हर क्षेत्र में हब (गढ़) बनाकर काम करने का चलन शुरू हो गया है जिससे हबोनॉमिक्स की नई धारणा का उदय हुआ.

स्वाधीनता के बाद से ही भारत में औद्योगिक विकास की अवधारणा दोमुखी दृष्टिकोण पर आधारित रही है: 1) रोजग़ार के अवसर दिलाना और 2) इन अवसरों को जहां तक संभव हो क्षेत्रीय विकास के साधन के तौर पर गांवों तक ले जाना. ऐसे दृष्टिकोण ने बड़ी संख्या में अद्र्ध-शहरी केंद्रों के पनपने में उल्लेखनीय योगदान दिया है जिससे देश में सूक्ष्म, लघु और मझौले उद्यमों को फलने-फूलने का मौका मिला है.

शहरों में अमीर और गरीब दोनों रहते हैं जिनका आमदनी के अवसरों के बारे में अपना- अपना अलग नज़रिया और तरीका है. स्व रोजग़ार में स्थानीय अर्थव्यवस्था में योगदान देने की क्षमता है. लोक नीति ऐसी होनी चाहिए जो शहरी और ग्रामीण इलाकों में संपर्क स्थापित कर सके.

‘मेक इन इंडिया’ राष्ट्रीय अभियान के रूप में की गई बेहद प्रत्यक्ष पहल है जिसे दो स्तरों पर अपनाए जाने की ज़रूरत है. सबसे पहले तो  भारी मात्रा में विदेशी और घरेलू निवेश आकर्षित करना होगा. दूसरे, इन बड़े उद्यमों को भी ठेके पर काम कराने के तंत्र स्थापित करने और सेवा प्रदान करने के लिए सूक्ष्म, लघु और मझौले उद्यमों की ज़़रूरत होती है. सूक्ष्म, लघु और मझौले उद्यमों से काम कराने के लिए उनकी क्षमताओं के बारे में जानकारी होना ज़रूरी है.

चुनौतियां और अवसर

स्वाधीनता के बाद से  नियोजन काल के दौरान एक नीति निर्धारित करने के लिए कई प्रयोग किए गए जैसा कि ऊपर बताया गया है. हालांकि नीति नियोजन के तहत उन क्षेत्रों में केंद्रीयकृत संस्थागत ढांचे और नीतिगत तंत्र स्थापित करना आवश्यक था जहां स्थानीय अर्थव्यवस्था पर असर डालने वाले निर्णय लिए जाने थे. इसी तर्क के आधार पर एक तरफ आधुनिक लघु उद्योगों और दूसरी तरफ ग्रामीण उद्यमों पर ध्यान देने वाले विभाग साथ-साथ काम करते रहे (इसके उदाहरण सूक्ष्म, लघु और मझौले उद्यम और कपड़ा मंत्रालयों के अंतर्गत विभिन्न विभाग हैं). दोनों के सह-अस्तित्व में सामंजस्य रखने के लिए निरंतर प्रयास किए गए लेकिन उनके अक्सर  वांछित परिणाम नहीं मिले. इसलिए लोक कार्यक्रमों की प्रासंगिकता, खासकर स्थानीय लोगों और उनकी आजीविका पर असर डालने की उनकी क्षमता पर फिर गौर करने की जरूरत है.

ऊपर से नीचे और दाएं से बाएं, हर ओर से समस्याएं है. एक तरफ स्थानीय स्तर पर लोगों की आकांक्षाओं में, सहकार और टकराव दोनों दिखाई देते हैं. कुछ आकांक्षाओं जैसे कि स्थानीय स्तर पर बुनियादी ढांचे की आवश्यकता पर टकराव की आशंका कम है जबकि अधिकांश निर्मित वस्तुओं और सेवाओं के मामले में  हितों का टकराव होता है. इसलिए स्थानीय संदर्भ में ‘विकास’ की परिभाषा सभी के लिए एक जैसी नहीं है. इसलिए अब  ‘विकास’ को परिभाषित करने और अपनाने के नए तरीके की आवश्यकता है.  ‘विकास’ का उद्देश्य है जन कल्याण सुनिश्चित करना और उसका दायरा ज़्यादा से ज़्यादा बढ़ाना. ‘कल्याण’ की अवधारणा भी एकसमान नहीं हो सकती. इसलिए ज़रूरी है कि इन बातों को ध्यान में रखते हुए  ठोस कदम उठाए जाएं- 1) व्यक्ति को ‘विकास’ के केंद्र में रखा जाए और 2) ‘कल्याण’ को न्यूनतम स्तर के संदर्भ में  परिभाषित किया जाए.

जन कल्याण के तीन अंग हैं: क) आर्थिक, ख) सामाजिक, ग) पर्यावरणीय. किसी भी स्थानीय आर्थिक विकास नीति को इन तीनों तत्वों को भागीदारी के साथ आर्थिक गतिविधियों में ढालना चाहिए. ये ज़रूरी है कि इस तरह की जो भी नीति तैयार की जाती है उससे ऐसा न्यूनतम आर्थिक आधार तैयार होना चाहिए जो अधिकांश स्थानीय आबादी को संतुष्ट कर सके. यह  भी महत्वपूर्ण है कि इस न्यूनतम आधार का कुछ स्वीकृत सामाजिक मानकों से टकराव न हो. इसके अतिरिक्त पर्यावरण पर भी इस तरह ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है कि स्थानीय आर्थिक विकास के प्रयास टिकाऊ हों और भावी पीढ़ी के लिए स्वीकार्य हों.

राष्ट्रीय हित और लक्ष्य तो ऊपर बता दिए गए हैं किंतु दुनियाभर में पूँजी के हित ऊपर से नीचे की तरफ चलते हैं. इसलिए क्षेत्रीय स्तर पर विकास के एजेंडे को आकार देना मुश्किल काम है. समुचित प्रमाणों के आधार के बिना  भारत सूक्ष्म, लघु और मझौले उद्यमों के विकास के मौजूदा कार्यक्रमों को जारी नहीं रख सकता.

समेकित विकास दृष्टिकोण की आवश्यकता

अर्थव्यवस्था की उभरती जटिलताओं को देखते हुए सूक्ष्म, लघु और मझौले उद्यमों के लिए समेकित विकास दृष्टिकोण की ज़रूरत है. विभिन्न अवसरों और महत्वपूर्ण अवरोधों को पहचानने की ज़रूरत है. नए शोधों और साक्ष्यों के आधार पर निम्नलिखित पर बल देते हुए मौजूदा नीतियों की समीक्षा करके उन्हें पुनर्परिभाषित किया जाना चाहिए:

राजनीतिक एवं प्रशासनिक अधिकार: संविधान के 56वें संशोधन के अंतर्गत ग्रामीण औेर लघु उद्योग स्थानीय सरकारों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं. भारत के निचले स्तर पर भारी भरकम औद्योगिक ढांचे में बड़ी संख्या में लघु और बहुत छोटे उद्यम ज्यादातर छोटे कस्बों और गांवों में होते हैं और देश के लघु उद्यम उत्पादन में योगदान देते हैं. इसका तात्पर्य यह भी है कि देश में उद्यमिता का पनपना और उद्यमिता संसाधनों का आकार लेना एक स्थानीय प्रक्रिया है.

क्षमताएं- यह  समझना भी महत्वपूर्ण है कि प्रशासन के ये निचले स्तर और उनके प्रशासनिक तंत्र ऐसे अधिकारों का इस्तेमाल निष्पक्ष रूप से करने में सक्षम हैं या नहीं. स्थानीय आर्थिक विकास कार्यक्रमों और विशेष रूप से उद्यम विकास कार्यक्रमों के संदर्भ में इन क्षमताओं की मौजूदा स्थिति की समीक्षा होनी चाहिए. एक घटक जो अक्सर गायब रहता है वह है किसी भी उद्यमिता गतिविधि के नियोजन और कार्यान्वयन के विभिन्न स्तरों पर परामर्श सेवाएं (जिनका आज स्थानीय और राज्य दोनों स्तरों पर अभाव है). जहां तक ‘क्षमता’ शब्द का सवाल है ऐसी सेवाओं को प्राथमिकता दी जानी चाहिए बजाय इसके कि जि़ले से पंचायत तक की प्रशासनिक स्तरों की बहुलता हो. वास्तव में स्थानीय सरकारों के स्तर पर समन्वयक और मार्गदर्शक  तंत्र का होना ज़रूरी है. किंतु, तथाकथित ‘प्रशासन’ से परे विशेष कार्यशील क्षेत्रों पर इस प्रकार ध्यान दिए जाने की ज़रूरत है:

क) प्रोजैक्ट प्रस्तावों और कारोबार के अवसरों की पहचान करना, ख) सामान्य जानकारी और मार्गदर्शन का प्रावधान करना, ग) आगे के लिए सहायक सेवाओं, और घ) डॉक्यूमेंटेशन तथा नेट वर्किंग के साथ-साथ सामंजस्य के लिए आधार तैयार करना. इन दायित्वों का निर्वाह निपुण बीडीएस प्रदाता सबसे अच्छी तरह कर सकते हैं.

लघु और मझौले उद्यमों को, नई अर्थव्यवस्था के उभरते लाभों का उपयोग करने की सामर्थ्य देने में सरकारों को अधिक से अधिक उत्प्रेरक की भूमिका निभानी होगी. कारोबार विकास सेवाओं को मज़बूत करने और सामाजिक पूंजी आधार तैयार करने से स्थिति सुधारने में मदद मिलेगी. जहां तक बाधाओं का सवाल है, लघु और मझौले उद्यमों के लिए जानकारी की सुलभता आज भी कठिन है. प्रौद्योगिकी इतनी विघ्नकारी होती जा रही है कि जब तक नई प्रौद्योगिकी अपनाने की नौबत आती है वो पुरानी पड़ चुकी होती है.

संसाधन: राज्य सरकारों और स्थानीय सरकारों के बीच संसाधनों के बंटवारे के मौजूदा फार्मूले के अंतर्गत उद्यम विकास से जुड़ी बुनियादी स्तर की अनेक  संवद्र्धन गतिविधियों में तालमेल के लिए ज़रूरी आवश्यक संसाधन स्थानीय सरकारों के पास उपलब्ध रहते हैं. आज जो संवद्र्धन गतिविधियां जि़ला उद्योग केन्द्र चला रहे हैं उनमें से कुछ को सम्बद्ध धनराशि के साथ स्थानीय सरकारों को सौंपा जा सकता है. इससे स्थानीय सरकारों को आवश्यक धन भी मिल जाएगा.

सामंजस्य का विकास: उद्यम विकास ऐसा क्षेत्र है जिसमें सामंजस्य और नेटवर्किंग की आजकल निर्णायक भूमिका हो गई है. आज एक तरफ केन्द्र तथा राज्य और दूसरी तरफ राज्य और जि़ला प्रशासन के बीच इस सामंजस्य को विकसित करने की बहुत ज़रूरत है. असल में तो जि़ला कलेक्टर कार्यालय ही विभिन्न समितियों के तंत्र के ज़रिए ये सामंजस्य बैठाता है जिसमें सम्बद्ध विभाग की अग्रणी भूमिका रहती है. इसका सीधा सा अर्थ है कि पेशेवराना रवैया एक सीमा तक ही काम आता है.

उद्यम विकास के लिए सामंजस्य बैठाने के लिए उद्यम क्षेत्र को लम्बवत् और क्षैतिज दोनों स्तरों पर मज़बूत करना बेहद ज़रूरी है. क्षैतिज स्तर पर विभिन्न सम्बद्ध विभागों को समझना होगा कि उद्यम एक विशेषज्ञता का विषय है. इसके लिए एक उद्यम संसाधन नीति की आवश्यकता है. स्पष्टता और मज़बूती का अर्थ यह होगा कि केन्द्र से लेकर स्थानीय सरकार तक सरकार के हर स्तर को अपनी-अपनी भूमिकाओं और क्रियाकलापों की स्पष्ट जानकारी होगी और वे जि़म्मेदारी से अपना-अपना काम कर सकेंगे. ऐसा नज़रिया न होने पर सरकार का हर स्तर अपनी-अपनी समझ से किसी न किसी कार्यक्रम या योजना की पहचान कर लेता है और उसे सरकार के निचले स्तरों पर थोपने की कोशिश करता है. इससे योजनाओं, जन आवश्यकताओं और आकांक्षाओं के बीच चौड़ी खाई पैदा हो जाती है.

नई पहलें

2014 से भारत सरकार ने कौशल, उद्यमिता विकास और विनिर्माण संवद्र्धन से जुड़े पहलुओं के बारे में अनेक कदम उठाए हैं. समन्वित दृष्टिकोण का असर दो तरह से दिखाई देता है: 1) नीतिगत ढांचे का विकास, और 2) इन सम्बद्ध पहलुओं पर ध्यान देने के लिए विशेष रूप से संरचित कार्यक्रमों का अपनाया जाना. भारत को विनिर्माण का गढ़ या हब बनाने के लिए ‘मेक इन इंडिया’ की घोषणा प्रमुख कार्यक्रम के रूप में की गई. इस वृहत कार्यक्रम के अंग के रूप में अनेक अन्य कार्यक्रम शुरु किए गए.

कौशल भारत या हुनरमंद भारत की शुरूआत कौशल के अभाव की गंभीर समस्या को दूर करने के लिए की गई. कौशल को तकनीकी और प्रबंधन दोनों तरह के कौशल के संदर्भ में फिर से परिभाषित किया गया. ऐसा सोचा गया कि कौशल के संदर्भ में इस तरह के समन्वित दृष्टिकोण से एक तरफ कंपनियों की आवश्यकताएं पूरी होंगी तो दूसरी तरफ गांवों से शहरों को पलायन पर लगाम लगेगी. इस तरह माना गया कि कौशल उद्यमिता विकास की खुराक है.
लोगों को कौशल देने के एजेंडा को उद्यमिता संवद्र्धन से सही ढंग से जोडऩे के लिए स्टार्ट-अप इंडिया नाम से एक अलग कार्यक्रम शुरू किया गया है. इस कार्यक्रम की संकल्पना नई अर्थव्यवस्था के उद्धव से जुड़ी भारत की संभावनाओं का लाभ उठाने के लिए की गई और यह उसी दिशा में प्रयासरत है.

नीतिगत पहल: निहितार्थ

इस संदर्भ में एक गंभीर सवाल यह है कि भविष्य में कार्रवाई की दिशा क्या होगी. क्या देश को सूक्ष्म, लघु और मझौले उद्योग को अतीत की तरह बहुत हद तक अनौपचारिक स्वरूप में ही रहना होगा या हमें सोची-समझी रणनीतियों के दम पर इस क्षेत्र को औपचारिक स्वरूप देने की दिशा में आगे बढऩा चाहिए. इसके लिए अनेक कदम उठाने होंगे- बेहतर टेक्नोलॉजी का उपयोग, बेहतर संगठन, बेहतर प्रबंधन विधियों को अपनाना औऱ अधिक उन्नत विकास कार्यक्रम तैयार करना. भारत सरकार ने इस क्षेत्र में नवाचार की गति तेज़ करने का रास्ता अपनाया है.

सरकार ने जो भी कदम उठाए हैं उनका कुल मिलाकर असर उद्यम तंत्र को औपचारिक स्वरूप प्रदान कर प्रगति के रूप में सामने आया है. अगला कदम इन परिणामों को टिकाऊ बनाने के लिए पंचमुखी नीति अपनाने का होना चाहिए: 1) सूक्ष्म, लघु और मझौले उद्यम बहुल उप क्षेत्रों को गहराई से समझना, 2) ग्रामीण-शहरी, पुरुष-स्त्री जैसे पुराने मापदंडों के बजाय स्पष्ट कामकाज मापदंडों के आधार पर अर्थव्यवस्था के संचालन की नए सिरे से व्याख्या करना, 3) विस्तृत अध्ययनों के आधार पर संस्थाओं की भूमिका को युक्ति संगत बनाना, 4) वित्त की भूमिका की नए सिरे से व्याख्या करना और वित्त तथा भू-सम्पत्ति क्षेत्र के बीच के संबंध में फेरबदल करना, 5) उद्यमिता को महत्वपूर्ण संसाधन के रूप में विकसित करने की योजना बनाना.

निष्कर्ष

स्थानीय आर्थिक विकास में सूक्ष्म, लघु और मझौले उद्यमों की महत्वपूर्ण भूमिका  के साथ-साथ स्थानीय आर्थिक विकास की आवश्यकता पर आज कोई विवाद नहीं हो सकता. किंतु नीतिगत अवधारणा और रणनीतिक दृष्टिकोण की बारीकियों में पहले की तुलना में कहीं अधिक स्पष्टता लाने की आवश्यकता है. किंतु इस क्षेत्र में नया दृष्टिकोण अपनाते समय हमें ध्यान रखना होगा कि आधे-अधूरे दृष्टिकोण से काम नहीं चलेगा. सामान्यत: वृहत आर्थिक नीति पर ध्यान देना ज़रूरी है. उतना ही महत्वपूर्ण उस संदर्भ को समझना भी है जिसमें देश की क्षेत्रीय विविधता को उद्यम विकास के लिए संभावना का स्रोत माना जाता है.

(लेखक, लघु उद्यम और विकास संस्थान, कोचीन के निदेशक हैं. ईमेल: director@isedonline.org सौजन्य: योजना)

साभार रोजगार समाचार से.

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