48 महीनो में कृषि क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति हुई – राधा मोहन सिंह

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में पिछले 48 महीनों में देश में आये बदलाव के अनुपात, गति, एवं नवीनता पर आप क्या कहेंगे?

प्रधान मंत्री श्री नरेंदर मोदी जी के नेतृत्व में पिछले 48 महीनो में कृषि के क्षेत्र में अभूत पूर्व प्रगति दर्ज हुई है जिसमे न केवल उत्पादन और उत्पादकता ही बढ़ी है वरन कृषि क्षेत्र के नीतिगत सुधारो में भी गति और नवीनता आई है। यदि बदलाव के अनुपात की बात की जाये तो खाद्यान उत्पादन के क्षेत्र में 9.35% की प्रगति दर्ज करते हुए वर्ष 2014-18 का औसतन उत्पादन, वर्ष 2010-14 के 255.59 मि. टन से बढ़ कर वर्ष 2017-18 में (तीसरे अग्रिम आंकलन के अनुसार) 279.51 मि. टन हुआ है। इसी तरह दलहन के क्षेत्र में 2010-14 के औसतन उत्पादन की अपेक्षा 2014-18 के दौरान 10.5% की वृद्धि दर्ज हुई है। बागवानी के क्षेत्र में वर्ष 2017-18 के (प्रथम अग्रिम आंकलन के अनुसार) दौरान उत्पादन 15.37 % की वृद्धि दर्ज करते हुए पिछले पांच वर्षो (2010-11 से 2014-15) के औसतन उत्पादन 264.99 मि.टन से बढ़ कर 305.43 मि.टन हो गया है।

 

कृषि के इस बदलते परिवेश में, नीली क्रांति के अंतर्गत मत्स्य पालन के क्षेत्र में भी वर्ष 2010-14 की अपेक्षा 2014-18 के दौरान 26.01% की वृद्धि दर्ज की गई जिसे देखते हुए वर्ष 2020-21 के लिए 15 मिलियन मि.टन का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। श्वेत क्रांति के अंतर्गत पशु पालन व् दुग्ध उत्पादन के क्षेत्र में भी वर्ष 2010-14 की तुलना में वर्ष 2014-18 के दौरान 23.69% की वृद्धि दर्ज की गई।कृषि सहकारिता के क्षेत्र में भी 155.58% की प्रगति दर्ज हुई है ।

जब हमारी सरकार ने वर्ष 2014 में केंद्र में सत्ता संभाली थी तो हमने किसानों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी थी। इस मंतव्य के मध्यनज़र सरकार की सभी पहलों, नई स्कीमों, कार्यक्रमों और मिशनों को नया रूप प्रदान किया गया। इन नवीन अवसंरचनाओं में कृषि के सतत विकास के साथ साथ कृषि लागत में कमी, मंडियोंमें कृषि उत्पादों की कीमतो की बेहतर वसूली आदि शामिल थे। गतिविधियों की निरंतरता पर आधारित हमारी इन नई पहलों में शामिल है–

  • नीम लेपित यूरिया, मृदा स्वास्थ्य कार्ड और प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (पीएमकेएसवाई) से संसाधनों के बेहतर उपयोग का मार्ग प्रशस्त करने के साथ-साथ कृषि की लागत में कमी लाना।

हमारीसरकार के 48 महीनों में कुल 14.20 करोड़ (प्रथम चक्र में 10.7 तथा द्वितीय चक्र में 3.5 करोड़) किसानों को 1234.97 करोड़ की राशि से राष्‍ट्रव्‍यापी कार्यक्रम के तहत स्‍वॉयल हेल्‍थ कार्ड उपलब्‍ध कराए गए हैं।

  • परम्परागत कृषि विकास योजना (पीकेवीवाई) और पूर्वोत्तर क्षेत्र जैविक मूल्य श्रृंखला विकास मिशन (एमओवीसीडी-एनई) के तहत मृदा स्वास्थ्य से संबंधित समस्याओं का निदान करने के साथ-साथ वर्षा सिंचित और पर्वतीय क्षेत्रों में निरंतर उत्‍पादन करने में आड़े आने वाली समस्‍याओं का समाधान करना।

आज मै गर्व के साथ आपको बता सकता हूँ कि मोदी सरकार के 48 महीनों में परम्‍परागत कृषि विकास योजना प्रारम्‍भ कर 947 करोड़ की राशि से 10,000 समूहों (क्‍लस्‍टर) का गठन भी कर दिया गया है और पूर्वोत्‍तर राज्‍यों के लिए अलग से जैविक मूल्‍य श्रृंखला विकास मिशन प्रारम्‍भ किया गया है जिसके तहत अब तक 93 Farm Producer Company (FPC) तथा 2,429 किसान हितधारक समूहों (FIGs) का 225.96 करोड़ की राशि से गठन कर 50,000 किसानों को जोड़ा जा चुका है।

  • राष्ट्रीय गोकुल मिशन, नीली क्रांति, दलहन उत्पादन कार्यक्रम और एमआईडीएच के माध्यम से कृषि के विभिन्न उप-क्षेत्रों में अधिक से अधिक उत्पादन प्राप्त करना।

हमारी सरकार के 4 वर्षों में पहली बार देसी नस्लों के संरक्षण एवं संवर्धन हेतु राष्ट्रीय गोकुल मिशन प्रारंभ किया गया है। इस योजना के तहत 31 मार्च 2018 तक राज्यों में 546.15 करोड़ रुपए की राशि जारी की गई है।मत्स्य उत्पादन के क्षेत्र में मोदी सरकार के 4 वर्षों के दौरान औसत वार्षिक खर्चापिछली सरकार के 10 वर्षो के खर्च 95.61 करोड़ से बढ़ कर 407.58 करोड़ हो गया है औरऔसत मछली उत्पादन 7.8 मिलियन मीट्रिक टन से 11.26 मिलियन मीट्रिक टन हो गया है।

  • ई-नाम के प्रयोजन से एकीकृत राष्ट्रीय कृषि की संरचना सुनिश्चित करना।

मोदी सरकार के 48 महीनों के दौरान राष्‍ट्रीय कृषि बाजार (ई-नाम) 170.87 करोड़ की राशि से राज्‍यों की 585 विनियमित थोक मंडियों को एक ई-प्‍लेटफॉर्म से जोड़ दिया गया है। मुझे आप से यह साँझा करते हर्ष हो रहा है कि दिनांक 9 मई, 2018 तक इस पोर्टल पर 98,71,956 किसानों; 1,09,725 व्‍यापारियों और 61,220 कमीशन एजेंटों को पंजीकृत किया जा चुका है।

आज देश में चारो तरफ एक सकारात्मक माहौल दिख रहा है। अगर बात बजटीय आवंटन की करे और पिछली सरकार के वर्ष 2009 से 2014 तक के कृषि बजट को देखें तो यह 1,21,082 करोड़ था जो कि मोदी सरकार के 5 वर्षों (2014-19) में बढ़कर 2,11,694 करोड़ हो गया है। यह 74.5% की वृद्धि दर्शाता है।

वर्ष 2018 के लिए कृषि मंत्रालय का बजट आवंटन वर्ष 2017-18 के 51,576 करोड़ रूपए से बढाकर 58,080 करोड़ रूपए कर दिया गया है, वहीँ न्यूनतम समर्थन मूल्यों में वृद्धि, किसान उत्पादक संगठनो, कृषि संभार तंत्र, प्रसंकरण सुविधाओं और व्यवसायिक प्रबंधन से जुड़े कार्यो के संवर्धन के लिए ऑपरेशन ग्रीन; पूंजीगत निवेश के लिए एग्री मार्किट इंफ्रास्ट्रक्चर फंड, माइक्रो सिंचाई फंड, एक्क्वाकल्चर इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट फण्ड, डेयरी प्रसंकरण और इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट फण्ड (डी.आई.डी.) तथा समेकित भेड़, बकरी, सूअर और कुक्कट विकास कोष जैसे पूंजीगत निवेश भी किये गए है । यह सभी प्रयास कृषि को एक उद्यम के रूप में विकसित करने की दिशा में मील का पत्‍थर सिद्ध हो रहे है ।

जहाँ एक तरफ उत्पादकता लाभ के लिए राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन; बागवानी समेकित विकास मिशन; तिलहन और ऑयलपाम के लिए राष्ट्रीय मिशन; राष्ट्रीय गोकुल मिशन; राष्ट्रीयपशुधन मिशन; समेकित इनलैंड तथा समुंदरी मत्स्य पालन जैसी योजनाये चलाई जा रही है, वहीं कृषि लागत में कटौती के लिए मृदा स्वास्थ्य कार्ड व् नीम लेपित यूरिया के इस्तेमाल और हर बूंद से ज्यादा फसल संबंधी योजनाओं को लक्षित कर उनका सफल किर्यान्वन किया जा रहा है। लाभकारी आय स्त्रोत  के सृजन के लिए ई-नाम, शुष्क और ठन्डे भंडारण संसाधन, ब्याज की रियायती दरो पर भण्डारण की सुविधाए और कटाई पश्चात् ऋण की सुविधा तथा वार्षिक आधार न्यूनतम सपोर्ट प्राइस बढाने आदि पर जोर दिया गया है तथा जोखिम प्रबंधन एवं स्थाई पद्धतियां अपनाने हेतु प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, परम्परागत कृषि विकास योजना तथा उतरपूर्वी राज्यों के लिये जैविक खेती पर मिशन आदि के माध्यम से सतत कृषि को बढ़ावा दिया जा रहा है ।

इन सब प्रयासों से कृषि को न केवल समयबध तरीके से गति मिली है वरन उसमे नवीनता का भी शत प्रतिशत संचार हुआ है ।

आपके मंत्रालय की सब से ज्यादा प्रभावी स्कीमें कौन सी है?

आज सरकार का ध्येय है किकृषि नीति एवं कार्यक्रमों को कैसे ‘उत्पादन केंद्रित’ के बजाय ‘आय केंद्रित’ बनाया जा सके। इस महत्वाकांक्षी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए माननीय प्रधानमंत्री जी द्वारा सुझावित ‘बहु-आयामी सात सूत्रीय’ रणनीति को अपनाने पर बल दिया गया है, जिसमे शामिल हैं-

  1. ‘’प्रति बूंद अधिक फसल’’ के सिद्धांत पर प्रयाप्त संसाधनों के साथ सिंचाई पर विशेष बल।
  2. ‘प्रत्‍येक खेत की मिटटी गुणवत्ता के अनुसार गुणवान बीज एवं पोषक तत्वों का प्रावधान।
  3. कटाई के बाद फसल नुक्सान को रोकने के लिए गोदामों और कोल्डचेन में बड़ा निवेश।
  4. खाद्य प्रसंस्‍करण के माध्‍यम से मूल्‍य संवर्धन को प्रोत्साहन ।
  5. राष्ट्रीय कृषि बाज़ार का क्रियान्वन एवं सभी 585 केन्द्रों पर विकृतियों को दूर करते हुए ई – प्लेटफार्म की शुरुआत।
  6. जोखिम को कम करने के लिए कम कीमत पर फसल बीमा योजना की शुरुआत।
  7. डेयरी-पशुपालन, मुर्गी-पालन, मधुमक्‍खी–पालन, मेढ़ पर पेड़, बागवानी व मछली पालन जैसी सहायक गतिविधियों को बढ़ावा देना।

इन्ही सात सूत्रों से जुडे कार्यक्रम सबसे अधिक प्रभावी है जो कृषि की लागत में कमी के साथ साथ किसान की आय में वृद्धि का स्त्रोत है।

इन सात सूत्रों से जुडी हुई स्कीमें आज मंत्रालये की प्रभावी योजनाये है.

आप इन पहलों की सफलता और पहुँच का आंकलन कैसे करते है?

वर्ष 2012-13 में देश में कृषि परिवारों की औसत आय काफी कम अर्थात 6,426 रू. प्रति माह थी और उनका मासिक खर्च 6,223 रू. था और बचत सिर्फ 203 रूपए। इस तरह से कोई भी यह कल्पना कर सकता है कि इतनी कम आय से किसानों का पूर्ण रूपेण कल्याण सुनिश्चित करना कितना कठिन कार्य हो सकता है। हमारीसरकार के लिए कृषि क्षेत्र में यह एक बड़ी और हकीकतपूर्ण चुनौती थी।लेकिन सरकार की नीतिगत योजनाये, उन्हेंकिर्यान्वन में लानेके समयबद्ध प्रयास और सबसे महतवपूर्ण बात वर्ष 2018 का कृषि के लिए बजट प्रावधान जो जन सामान्य की उम्मीद से कहीं अधिकहै ।

आज हमें इन सब प्रयासों के सकारात्मक परिणाम मिलने भी शुरू हो गए है। उदाहरण के तौर पर राष्ट्रीय उत्पादकता परिषद द्वारा 19 राज्यों के 76 जिलो में किये गए अध्ययन से पता चलता है कि किसानो द्वारा बड़े पैमाने पर मृदा स्वास्थ्य कार्ड को अपनाया जा रहा है। सर्वे में शामिल 90% किसानो ने बताया की उपरोक्त स्कीम के किर्यान्वन से पहले उन्होंने कभी अपनी मृदा की जांच नहीं करवाई थी। अध्ययन से यह भी पता चला है कि जहाँ रासायनिक खादों के इस्तेमाल से लगभग 5-6% की कमी आई है वहीँ मृदा स्वास्थ्य कार्ड के आधार पर प्रस्तावित जैविक खादों के उपयोग व् सूक्षम पोषक तत्वों के इस्तेमाल से पैदावार में 5-6% की वृद्धि भी दर्ज हुई है ।

कृषि क्षेत्र सभी व्यवसायों में सर्वाधिक जौखिम पूर्ण व्यवसाय है। जब खेत पर बुवाई की जाती है जब भी जोखिम रहता है और जब फसल काटने के बाद उसे मंडी पहुंचाया जा जाता है उस समय भी जोखिम रहता है। किसान कभी भी इस बारे में पूर्णत: आश्वस्त नहीं हो पाता कि उसके उत्पादन की उसे सही कीमत मिलेगी या नहीं। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के जरिए व्यापक फसल बीमा स्कीम हमारी सरकार की महत्वपूर्ण पहलों में से एक है। 2010-14 खरीफ मौसम की तुलना में 2014 -18में ऋणी व् गैर ऋणी किसानो के कुल व्याप्ति में 63.68% की वृद्धि दर्ज हुई है।  उल्लेखनीय है कि गैर ऋणी किसानो के व्याप्ति में 173.17% की वृद्धि हुई है । 2010-14 कीरबी मौसम की तुलना में 2014 -18 में ऋणी व् गैर ऋणी किसानो के कुल व्याप्ति में 38.76 % की वृद्धि दर्ज हुई है।  उल्लेखनीय है कि गैर ऋणी किसानो के व्याप्ति में 102.56 % की वृद्धि हुई है।

यह सब तथ्य तथा आंकड़े यह बताते है कि इन पहलों की सफलता के परिणाम आने शुरू हो गए है।

जब आपने कार्यभार संभाला तो कृषि क्षेत्र के क्या समस्याएं थी और आपने उन पर कैसे काबू पाया?

भारतीय कृषि आज जिस बेहतर स्तिथि में है उसे पाना आसन काम नहीं था। हम सब जानते है कि कृषि क्षेत्र की समस्याएँ बड़ी जटिल रहीहै।भारत जैसे विशाल और आर्थिक विषमताओं वाले देश में दूर-दराज के दुर्गम इलाकों तक और समाज के सबसे कमजोर वर्ग तक अनाज की भौतिक और आर्थिक पहुँच सुनिश्चित करना एक कठिन चुनौती साबित होरही थी। भारत में कृषि का आधुनिकरण ना होना, भारतीय कृषि में प्राचीन कृषि पद्धतियों का चलन, नगदी फसलों की तुलना में पुरानी रबी खरीफ फसलों के उत्पादन पर ध्यान, प्राचीन कृषि पद्धति से उत्पादन,साल दर साल चली आ रही समस्याए थी। भारत में जैविक खेती का ना होना एक प्रमुख समस्या थी।भंडारण और बाजारों की कमी जिससेखाद्य उत्पादों के उत्पादन के पश्चात उनके भंडारण एवं उन्हेंबेचने के लिए व्यापक बाजारों में कमी आदि ऐसी समस्याए थी जिनपर पिछली सरकार ने कोईध्यान नहीं दिया, जिससे वर्तमान सरकार को इन सन चुनौतियों से जूझना पड़ा।बागवानी फसलों के उत्पादन में कमी एवं पशुपालन जैसी व्यवस्थाओं में कमी के कारण कृषि का व्यवसायीकरण नहीं हो पा रहा था।इसके परिणाम स्वरुप किसानों की आर्थिक स्थिति में सुधार लाना एक बहुत बड़ी चुनौती साबित हो रही थी।इन सब के अतिरिक्त जैविक उत्पादों के उत्पादन, कृषि से जुड़े सहायक धंधे जैसे मछली पालन,मधुमक्खी पालन, फसल बीमा, फसलों को कीड़ों से सुरक्षा, भूमि सुधार कीसमस्या, मृदा के उपजाऊ बनाए रखने की समस्या, जल संचरण जैसी चुनौतियां कृषि को प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित कर रही थी।कृषि का व्यापारीकरण ना होना और आर्थिक रुप से किसानों का सशक्त ना होना भीचिंता केविषय थे।उत्पादन की गुणवत्ता पर नियंत्रण के साथ-साथ कृषि की संरचना में बुनियादी व्यवस्थाओं में परिवर्तन एवं नवीनतम तकनीकों का प्रयोग ना होना गहन सोच का विषय थाऔरसबसे हट कर जो चिंता का विषय था वो था कृषि को लाभप्रद बना यह सुनिश्चित करना कि उत्पादन व् उत्पादकता के साथ साथ किसानो की जेब भी भरे और उनकी आय में भीवृद्धि हो।

 

वर्ष 2014-15 के दौरान सरकार की अनुकूलनीतियों, कारगर योजनाओं और प्रभावी क्रियान्वयन ने इस कार्य को बखूबी अंजाम दिया। वर्तमान प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में देश में ‘क्लाइमेट स्मार्ट एग्रीकल्चर’ विकसित करने की ठोस पहल की गई है। इसके लिये राष्ट्रीय-स्तर की परियोजना लागू की गई है, जिसके अंतर्गत किसानों को जलवायु अनुकूल कृषि तकनीकें अपनाने के लिये जागरूक एवं सक्षम बनाया जा रहा है।सिंचाई के पानी की कुशलता बढ़ाने के लिये टपक सिंचाई, फव्वारा सिंचाई जैसी सूक्ष्म और कुशल तकनीकें विकसित की गई हैं, जिनका किसानों के खेतों तक प्रसार किया जा रहा है। इस कार्य में तेजी लाने के लिये ‘पर ड्रॉपमोर क्रॉप’ जैसे राष्ट्रीय कार्यक्रम लागू कियेगए है। भूमि की उर्वरता को सतत बनाए रखने के लिये ‘स्वस्थ धराखेत हरा’ जैसे कार्यक्रम शुरू किये गये हैं, जिसके अंतर्गत किसानों को बड़े पैमाने पर ‘सॉयल हेल्थ कार्ड’ जारी किये जा रहे हैं। वर्तमान सरकार की पहलों से कृषि से जुड़े जोखिम को कम करने के लिए एक नई योजना- ‘’प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना’’ पूरे देश में कार्यान्‍वित की जा रही है । कृषि के जोखिम को कम करने के लिए कृषि क्षेत्र में यह सबसे बड़ा निवेश है।

आपको बहुत से ऐसे लोग मिले होंगे जोआपके नेतृत्व में चलाई जा रही आपके मंत्रालय की स्कीमो से बहुत लाभान्वित हुए होंगे । ऐसे कुछ यादगार अनुभव व् कुछ अनकही कहानियां आप हमसे साँझाकरना चाहेंगे?

मै जब भी किसानो से बातचीत करता हूँ तो वो मुझे मेरे मंत्रालय की स्कीमो परफीडबैक देते रहते है और बताते है कि किस प्रकार इन स्कीमो से वो लाभान्वित हुए। ऐसे ही सतपारा,त्रिपुरा के एक किसान है, चैत्र मोहन देब बर्मा जो अदरक, सब्जियों जैसे कद्दू करेलाव् दलहन फसलो में तुर व्बीन्स आदि की खेती करते है। उनके पास चार कन्नी ज़मीन हैउन्होंने बताया कि उन्होंनेउत्तर पूर्वी राज्यों के लिए ‘जैविक मूल्‍य श्रृंखला विकास मिशन’ के अंतर्गत जैविक खेती की जानकारी प्राप्त करकेप्रति कन्नी 400 किलो गोबर का इस्तेमाल कियाऔरउन्हें औसतन प्रति कन्नी 12 कविन्टल अदरक की उपज मिली। अपनी चार कन्नी से 48कविन्टल कीउपज पाकर वह बेहद खुश थे। जब उनसे यह पूछा गया कि वो अपने साथी किसानोको क्या सन्देश देना चाहेंगे तो उन्होंने बताया कि मैअपने जैसे किसान भाईओं को बतानाचाहूँगा कि अपनी ज़मीन को खाली मत छोडे और सरकार की जैविक खेती को बढ़ावा देने वाली स्कीमो की जानकारी ले और उन्हें अपनाकर कम लागत में मेरी तरह अधिक उपज प्राप्त करे तभी वो अपने परिवार का अच्छे से भरण पोषण कर सकते है। ऐसे ही मुझे राजस्थान के कुछकिसानो ने बताया की पी.के.वी.वाई जैसी योजनाओ से प्राप्त जानकारी सेउन्होंने कैसे वर्मी कम्पोस्ट तैयार कीतथा नीम की पती, धतूरा, आंकड़ा, गौ मूत्र आदि से वर्मी वाश तैयार करके तथा टमाटर की फसल में लगी बिमारी में उसका स्प्रे करके कैसे अपनी फसल को बचायातथाजैविकतरीकों से बेर आदि की फसलो में कैसे लाभ हुआ।कई किसानो ने बताया की जैविक खेती से उनकी फसलकी उन्हें बेहतर दाम मिले और यहाँ तक की जैविक तरीके से उगाई गईचारे की फसलों से उनके जानवरों से प्राप्त दूघ उत्पादन में भी वृद्धि हुई।ऐसी सफलता की कहानियांसुन कर व् पढ़ कर मुझे बहुत ख़ुशी होती है और ये मेरे व् मेरे मंत्रालय के अधिकारियों का काफी मनोबल बढाती है।

Source: Agriculture Ministry. 

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