भारत में लघु एवं मध्यम उद्यमों की दशा एवं दिशा

समस्त विश्व के आर्थिक विकास में लघु एवं मध्यम उद्यमों यानी स्मॉल एंड मीडियम इंटरप्राइजेज का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है. विकास शील एवं विकसित दोनों प्रकार की अर्थव्यवस्थाओं के औद्योगिक विकास में इन उद्यमों का योगदान रेखांकित किया जा सकता है.

नीतिकार भी प्रायः जानते हैं कि “एसएमई” क्षेत्र किसी भी देश की आर्थिक पुनर्स्थापना में बीज स्वरूप होता है. ये उद्यम रोजगार  सृजन में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं और सम्पूर्ण रोजगार सम्भावना का दो तिहाई हिस्सा यही क्षेत्र सृजित करता है. रोजगार की साध्यता के दृष्टिकोण से देखा जाय तो बड़े उद्योगों की तुलना में एसएमई क्षेत्र की इस सन्दर्भ में लागत भी काफी कम होती है.

एसएमई क्षेत्र कम लागत में सिर्फ अधिक रोजगार ही नहीं सृजित, बल्कि यह ग्रामीण एवं पिछड़े क्षेत्रों में भी बराबर से रोजगार मुहैय्या कराते हैं, जो कि बड़े उद्योगों और कॉर्पोरेट्स के बस की बात बिलकुल नहीं है. जिसके फलस्वरूप क्षेत्रीय असंतुलन दूर होता है तथा राष्ट्रीय आय एवं सम्पदा का समान वितरण होता है. ये उद्यम बड़े उद्योगों की सहायक इकाईयों के रूप में काम काम करते हुए देश के सामाजिक आर्थिक विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं.

लघु एवं मध्यम उद्यम विश्व बाजार में अपने देश और क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं तथा उन्हें, कहाँ से, कैसी प्रतिस्पर्धा करनी पड़ेगी, इसे भी चिन्हित करते हैं. लघु एवं मध्यम उद्यम किसी भी उद्यमी के लिए प्रथम रोजगार तथा प्रगतिक्रम की पहली पायदान होती है. समग्र अर्थव्यवस्था के लिए ये नए विचारों – कार्यों के संस्थापक, नई प्रक्रियाओं के जनक एवं संवाहक तथा उपलब्ध संसाधनों के उपयोगकर्ता होते हैं.

एमएसएमई क्षेत्र द्वारा छोटे एवं व्यक्तिगत व्यवसायी चिन्हित किये जाते हैं. विश्व के अधिकतर देशों में इन्हें वैयक्तिक क्षेत्र के विकासकर्ता के रूप में परिभाषित किया जाता है. विश्व भर के नीति नियामक एवं वित्तीय संस्थान एमएसएमई इकाईयों को विविध मापदंडों यथा कर्मचारी संख्या, वार्षिक बिक्री, संपदा मूल्य तथा ऋण राशि की सम्भावना वगैरह के आधार पर इनका निर्धारण करते हैं. इन मापदण्डों का समय समय पर पुनर्निर्धारण किया जाता है.

भारत सरकार के “माइक्रो, स्मॉल एंड मीडियम इंटरप्राइजेज डेवलपमेंट एक्ट – 2006” एसएमईडी एक्ट द्वारा एमएसएमई इकाईयों को परिभाषित किया गया है. पूर्ववर्ती परिभाषा में इन इकाईयों को विनिवेश मापदंड के आधार पर चिन्हित किया जाता था, अभी हाल में ही सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उपक्रम विकास (एमएसएमईडी) अधिनियम, 2006 की धारा 7 में संशोधन करते हुए इसे अब  “वार्षिक कारोबार” अथवा एनुअल टर्नओवर से जोड़ दिया गया है. इस परिवर्तन के बाद अब किसी भी एमएसएमई इकाई को इस प्रकार परिभाषित किया जाएगा:

  • जहां 5 करोड़ रुपये से अधिक का वार्षिक कारोबार नहीं होगा, वहां सूक्ष्म उपक्रम को एक इकाई के रूप में परिभाषित किया जाएगा.
  • जहां वार्षिक कारोबार 5 करोड़ से अधिक, लेकिन 75 करोड़ से ज्यादा नहीं होगा, वहां लघु उपक्रम को एक इकाई के रूप में परिभाषित किया जाएगा.
  • जहां वार्षिक कारोबार 75 करोड़ रुपये से अधिक है परंतु 250 करोड़ रुपये से अधिक नहीं, वहां मध्यम उपक्रम को एक इकाई के रूप में परिभाषित किया जाएगा.
  • इसके अलावा केन्द्र सरकार अधिसूचना के जरिए कारोबार सीमा में बदलाव कर सकती है, जो एमएसएमईडी अधिनियम की धारा 7 में उल्लेखित सीमा से तिगुनी से अधिक नहीं हो सकती.

पिछले पांच–छह दशकों में भारत के एमएसएमई उद्यम क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था में अत्यंत संवेदनशील एवं गतिमान क्षेत्र के रूप में विकसित हुआ है. वर्तमान में यह इकाइयाँ पारम्परिक एवं आधुनिक दोनों ही क्षेत्रों में विश्व के बेहतरीन उपक्रमों के साथ प्रतिस्पर्धा कर रही हैं. लघु एवं मध्यम उद्यम इकाइयाँ आज नए आर्थिक क्षेत्रों में यथा सूचना तकनीकि, शिक्षा, मनोरंजन, समाचार एवं संचार क्षेत्रों में प्रवेश करते हुए नए भारत की संकल्पना को गढ़ रही हैं. सामाजिक क्षेत्र में भी ये इकाईयां अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं. ये इकाइयां स्थानीय संसाधनों का उपयोग करते हुए उत्तम उत्पादों एवं सेवाओं का निर्माण कर रही हैं तथा निर्यात बाजार में भी सराहनीय स्थान प्राप्त कर रही हैं. आश्चर्य की बात यह है कि इस क्षेत्र की लगभग 50% इकाईयां समाज के संसाधनहीन तथा पिछड़े वर्गों के स्वामित्व में संचालित हो रही हैं. इन लघु एवं मध्यम इकाईयों में से 95% के करीब व्यक्तिगत स्वामित्व, 1.10% सहभागी स्वामित्व वाली हैं, 0.15% व्यक्तिगत अथवा प्राइवेट लिमटेड के रूप में, जबकि शेष सहकारिता अथवा विभिन्न ट्रस्टों के माध्यम से चलाई जा रही हैं.

इन लघु एवं मध्यम उद्यम इकाईयों में कम पूंजीगत ढांचा एवं उच्च श्रम ढाँचे के फलस्वरूप ग्रामीण औद्योगीकरण क्षेत्र में ये इकाईयां उल्लेखनीय योगदान प्रदान कर रही हैं. एमएसएमई उद्योग के अखिल भारतीय तथ्यों (गणना वर्ष 2006-07) के अनुसार इस क्षेत्र में कुल 361.76 लाख इकाईयां कार्यरत थीं, जिनमें से 200.19 लाख ग्रामीण इकाईयां थीं, जो कि कुल इकाईयों का 53.34% था. शहरी क्षेत्रों में स्थित इकाईयों की संख्या 161.57 लाख थीं, जो कि कुल इकाईयों का 44.66% था.

वैसे ये तथ्य तो मात्र सरकारी आंकड़ों से हैं, एमएसएमई क्षेत्र में कार्यरत बहुत सी छोटी इकाईयां कई बार इन आंकड़ों से परे रह जाती हैं. फिर भी मौजूदा दशक यानी 2010 से इस क्षेत्र में काफी विकास हुआ है और अब यह इकाईयां अधिक से अधिक व्यवस्थित होने का प्रयास कर रही हैं. अधिक से अधिक इकाईयां अब एसएमईडी एक्ट के अंतर्गत अपना पंजीकरण करा रही हैं. एमएसएमई मंत्रालय से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार 2010-11 में इस पंजीकरण में 11% की वृद्धि हुई, 2011-12 में 18% की, 2012-13 में 14% तथा 2013-14 12% की वृद्धि हुई, जबकि वर्ष 2014-15 में यह पंजीकरण प्रतिशत 17% रहा.

अन्य आंकड़ों पर यदि ध्यान दें, तो इस क्षेत्र में लगभग 50 मिलियन लोगों को रोजगार प्राप्त है. देश के सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी में इस क्षेत्र का 8% का योगदान है. यह क्षेत्र कृषि के बाद सबसे बड़ा रोजगार मुहैय्या कराने वाला क्षेत्र है. विनिर्माण अथवा मैन्यूफैक्चरिंग में इस क्षेत्र का योगदान 45% है जबकि कुल निर्यात में यह क्षेत्र 40% का योगदान प्रदान करता है.

कुल मिलकर यही कहा जाना चाहिए कि यह क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है और सरकारों को भी इस क्षेत्र का पूरा ध्यान रखना चाहिए. इनके लिए मूलभूत ढांचे, वित्त व्यवस्थापन तथा अन्य सुविधाओं हेतु अभी बहुत किया जाना बाकी है, जो कि मौजूदा एवं आगे आने वाली सरकारों को भी करना होगा.

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