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अपने स्टार्टअप अथवा नव-उद्यम के लिए मैं कंपनी के किस प्रकार को अपनाऊँ?

व्यावसायिक उद्यम के प्रकार फॉर्म्स ऑफ़ बिज़नेस एंटरप्राइज

किसी भी नव-उद्यम अथवा व्यवसाय की शुरुआत के लिए सर्वप्रथम आवश्यकता होती है एक व्यावसायिक इकाई का गठन. यह व्यावसायिक इकाई किस प्रकार की होनी चाहिए यह इस बात पर निर्भर करता है कि हमारा व्यवसाय क्या है, हमारी आवश्यकताएं क्या हैं. आइये हम यहाँ व्यावसायिक उद्यम इकाईयों के विभिन्न प्रकारों को संक्षेप में समझने की कोशिश करते हैं.

साझेदार इकाई अथवा पार्टनरशिप फर्म

सहभागिता अथवा साझेदारी एक सम्बन्ध है, जिसके अंतर्गत व्यक्तिओं के मध्य आपसी सहमति के आधार पर उनके द्वारा किये गए उद्यम या व्यवसाय के लाभांश में भागीदारी को अधिकृत किया जाता है. सहभागिता का अपने सहयोगिओं से अलग कोई स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं होता है. सभी सहभागी उद्योग अथवा व्यवसाय की परिसंपत्ति, देनदारी एवं करों के लिए व्यक्तिगत तथा सामूहिक रूप से उत्तरदायी होते हैं. सहभागिता अनुबंध के प्रभाव में उद्यम अथवा व्यवसाय के नियंत्रण, प्रबंधन एवं लाभ – हानि में सभी सहभागिओं का उत्तरदायित्व एवं भागीदारी बराबर की होती है. कोई भी सहभागी व्यवसाय का संचालन कर सकता है एवं तद्जन्य देनदारियों के लिए कम्पनी या इकाई उत्तरदायी होगी. किसी भी विदेशी इकाई द्वारा भारतीय सहभागिता कम्पनी में विनिवेश किया जा सकता है, इस विनिवेश हेतु भारतीय रिजर्व बैंक की पूर्वानुमति आवश्यक है.

व्यक्तिगत अथवा प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी    

व्यक्तिगत सीमित कम्पनी अथवा प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के लिए न्यूनतम 1 लाख रुपयों की प्रदत्त पूंजी या पेडअप शेयर कैपिटल आवश्यक है. यह इकाई ज्ञापनप्रपत्र एवं करारनामों के अनुबंधों के अनुरूप ही अपने व्यवसाय का संचालन एवं निष्पादन कर सकती है. प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी की कुछ ख़ास विशेषताएं होती हैं. इस प्रकार की इकाई के सहभागिता अनुबंध में यह प्रावधान आवश्यक है कि अंश पूंजी अथवा शेयर का हस्तांतरण प्रतिबंधित हो. इस प्रकार की इकाई में सदस्यों की न्यूनतम संख्या 2 तथा अधिकतम 200 तक हो सकती है, जिसमें भूतपूर्व एवं वर्तमान कर्मचारी न हों. कम्पनी के इस प्रकार के सहभागिता अनुबंध किसी भी प्रकार की जनभागीदारी अथवा अंशधारिता पर स्पष्ट प्रतिबन्ध है. प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी के पंजीयन में 3 से 4 हफ़्तों का समय लगता है, जो कि विभिन्न राज्यों में घट बढ़ भी सकता है.

सार्वजानिक अथवा पब्लिक लिमिटेड कम्पनी

किसी भी पब्लिक लिमिटेड कम्पनी के लिए न्यूनतम प्रदत्त पूँजी या पेडअप शेयर कैपिटल राशि 5 लाख रुपयों की होनी चाहिए. यह एक ऐसी कम्पनी कहलाती है, जो कि व्यक्तिगत अथवा प्राइवेट नहीं है लेकिन एक ऐसी प्राइवेट कम्पनी है जो कि एक पब्लिक लिमिटेड कम्पनी की सहायक के रूप में कार्य कर सकने के गुण समाहित कर रखे हैं. इसमें न्यूनतम सात सदस्य होते हैं तथा इसमें 200 से अधिक अंशधारक हो सकते हैं. यह अपनी प्रतिभूति या सिक्यूरिटी के लिए जनभागीदारी को भी आमंत्रित कर सकती है. अपने शेयर्स को वह किसी भी मान्यताप्राप्त स्टॉक एक्सचेंज पर आई.पी.ओ. के माध्यम से अधिसूचित या लिस्ट कर सकती है. प्रत्येक पब्लिक लिमिटेड कम्पनी में 25% की जनभागीदारी आवश्यक है, इसमें किसी भी गिरवट को ज्यादा से ज्यादा 12 महीनों में पुनर्स्थापित या रिस्टोर करना आवश्यक है. किसी भी विदेशी कम्पनी के लिए भारत के किसी भी स्थान पर अपने संस्थान की स्थापना की तीस दिन के भीतर “रजिस्ट्रार ऑफ़ कम्पनीज” के यहाँ निबंधन प्राइवेट या पब्लिक कम्पनी के रूप में आवश्यक है.

सीमित उत्तरदायित्व सहभागिता या लिमिटेड लायबिलिटी पार्टनरशिप एलएलपी       

सीमित उत्तरदायित्व सहभागिता प्रारूप की उद्यम इकाई के अंतर्गत किसी एक सहभागी के व्यवसायिक कृत्य, निर्णय अथवा कुप्रबंधन जन्य देनदारियों से अन्य सहभागिओं को सुरक्षा प्रदत्त होती है. भारत में कम्पनी का यह प्रकार अभी नया ही है, 2008 में ही इस प्रारूप को “लिमिटेड लायबिलिटी पार्टनरशिप एक्ट, 2008” द्वारा निगमित किया गया है. यह एक संघबद्ध इकाई या कॉर्पोरेट बॉडी है, जिसका अस्तित्व एक कानूनी व्यक्ति के रूप में होता है, जिसकी पहचान उसके सहभागिओं से अलग हो. इनमें विदेशी विनिवेश सरकार की स्वीकृति से उन क्षेत्रों में होता है जिनमें शतप्रतिशत विदेशी प्रत्यक्ष विनिवेश – एफडीआई आटोमेटिक रूट से अनुमान्य है, इसके लिए किसी परफॉरमेंस लिंक्ड शर्त का अनुपालन आवश्यक नहीं है.

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पुनःप्रकाशन: मयंक शर्मा द्वारा लिखा गया यह आर्टिकल पहले भी कई प्रकाशनों में प्रकाशित हो चुका है.

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