ईज ऑफ़ डूइंग बिज़नेस में अभी और ईज की है जरूरत

रोजगार, कौशल विकास, स्टार्टअप्स इत्यादि के स्वप्न मात्र स्वप्न ही बन कर रह जा रहे हैं. विदेशी एजेंसियां हमें चाहे सकारात्मक रेटिंग दे रही हों या फिर हम विश्व की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने जा रहे हों, लेकिन एक यह भी सत्य है कि उपरोक्त सन्दर्भों में कार्य कर हमारी किन्हीं भी योजनाओं ने 50% लक्ष्य की भी प्राप्ति नहीं की है.

देश में मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के लिए जोर शोर से प्रायोजित एवं विज्ञापित “मेक इन इंडिया” कार्यक्रम अभी तक तो मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र पर कोई विशेष प्रभाव नहीं डाल पाया है. दरअसल हमारे देश में समस्या योजनाओं की कभी नहीं रही, समस्या रही है तो उनके इम्प्लिमेंटेशन की.

हमारी सरकारें कागज पर योजनायें बनाने में बहुत माहिर रही हैं, लेकिन उनके कार्यान्वयन अथवा इम्प्लिमेंटेशन में वे हमेशा से फेल रही है. मौजूदा सरकार भी इम्प्लिमेंटेशन को लेकर कुछ विशेष अलग नहीं कर पाई है, अपनी पूर्ववर्ती सरकारों से एक स्तर पर अवश्य यह सरकार सफल रही है, वह है इस सरकार का जन संपर्क अभियान और इवेंट मनेजमेंट, इसके चलते ऐसा लगता रहा कि सरकार बहुत कुछ कर रही है, लेकिन जमीनी हकीकत नकारात्मक ही रही है.

यही कारण है कि विकास का मुद्दा ही अब नेपथ्य में पहुँच चुका है, रोजगार, कौशल विकास, स्टार्टअप्स, एमएसएमई, मेक इन इंडिया इत्यादि क्षेत्रों में कोई भी योजना गेम चेंजर नहीं सिद्ध हो सकी.

पिछले कुछ समय से एंजेल इन्वेस्टर्स तथा अन्य इन्वेस्टर्स भी जो कि स्टार्टअप फंडिंग में एक सकारात्मक भूमिका अदा कर रहे थे, अपना हाँथ पीछे खींच रहे हैं, वजह सिर्फ इतनी है कि इस प्रकार के निवेश के सन्दर्भ में नीतियाँ स्पष्ट और आसान नहीं हैं. सरकार “ईज ऑफ़ डूइंग बिज़नेस” का डंका अवश्य पीट रही है, लेकिन फिर भी दिल्ली अभी काफी दूर है.

नैसकॉम के अनुसार इसी वजह से स्टार्टअप फंडिंग में एंजल निवेशकों द्वारा निवेश में 53% की कमी आई है. नैसकॉम के चेयरमैन श्री रमन रॉय ने अभी हाल में ही एक कार्यक्रम के दौरान कहा कि “करों अथवा टैक्स से सम्बंधित जटिल नियमों ने स्टार्टअप्स को समर्थन दे रहे एंजेल इन्वेस्टर्स को लगभग मूक कर दिया है. उन्होंने बताया कि स्टार्टअप्स की सफलता अनुपात वैसे ही बहुत सकारात्मक नहीं है, हर वर्ष लगभग 30 से 35% स्टार्टअप्स बंद हो जाते हैं.

पिछले पांच वर्षों में 5000 नए स्टार्टअप्स जन्में हैं, जिनमें से 1000 इस वित्त वर्ष में ही शुरू किये गए हैं. अर्ली स्टेज एवं ग्रोथ स्टेज फंडिंग में अवश्य वृद्धि दर्ज हुई है, लेकिन सरकार को एंजेल इन्वेस्टमेंट एवं अन्य निवेशों के सन्दर्भ में विश्व स्तरीय आसान नियमों की स्थापना करनी चाहिए जिससे कि यह निवेश अन्य देशों में न जाकर अपने देश में ही आ सके.

कुल मिलाकर सरकार को योजनाओं के सफल कार्यान्वयन पर अपना ध्यान केन्द्रित करना चाहिए. देश के सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों यानी एमएसएमई इकाईयों की हैण्डहोल्डिंग की जानी चाहिए. व्यापारिक इकोसिस्टम के साथ साथ बैंकों एवं वित्तीय संस्थानों को इस क्षेत्र में निवेश के लिए प्रेरित करना चाहिए.

सत्य तो यह है कि हमारी सम्पूर्ण बैंकिंग व्यवस्था को नए सिरे से व्यवस्थित किया जाना अति आवश्यक है, बैंकों की एनपीए समस्या बड़े उयामिओं एवं कॉर्पोरेट जगत के ऋण डिफ़ॉल्ट की वजह से पैदा होती है, लेकिन इसका खामियाजा एमएसएमई इकाईयों एवं अन्य व्यापारिओं को झेलना पड़ता है.

कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि वर्तमान सरकार से सूक्ष्म, लघु उद्यमिओं एवं स्टार्टअप्स की असीम आस हैं और इन उम्मीदों पर खरा उतरना सरकार के लिए भी अति आवश्यक है.

 

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