पद्मश्री कल्पना सरोज

उद्यमिता एवं संघर्ष की एक सफल मिसाल: कल्पना सरोज

उद्यमिता की दुनिया में यदि झाँक कर अगर देखा जाय तो हमें संघर्ष की अनेकों गाथाएं मिल जायेंगी. आज SMEसमाधान के इस मंच पर आपके साथ एक ऐसी कहानी साझा करने जा रहे हैं, जो उद्यमिता एवं महिला_उद्यमिता की एक आदर्श मिसाल हैं. आज हम बात करेंगे महिला_उद्यमी पद्मश्री कल्पना सरोज की.

कल्पना सरोज (Kalpana Saroj) का जन्म महाराष्ट्र के अकोला जिले के छोटे से गाँव रोपरखेड़ा के एक दलित परिवार में 1961 में हुआ था. उनके पिता महाराष्ट्र पुलिस में हवालदार थे, कल्पना के 2 भाई, 3 बहनें, दादा – दादी और चाचा सभी साथ रहते थे और इन सबके बीच कमाने वाले सिर्फ पिता थे. 1960 के उस दौर में समाज रूढ़ियों में जकड़ा हुआ सा ही था, दलित एवं महिलाओं के हालात वह ग्रामीण स्तर पर बहुत अच्छे न थे. कल्पना गाँव के ही सरकारी स्कूल में पढ़ने जाया करती थीं और पढ़ने में काफी अच्छी भी थीं, लेकिन दलित और ऊपर से महिला होने के नाते उन्हें शिक्षकों एवं सहपाठिओं से भी उपेक्षा झेलनी पड़ती थी.

12 साल की कम उम्र में ही उनकी शादी मुंबई के एक गरीब परिवार में हो गई. वे मुंबई के एक झोपड़पट्टी इलाके या कह सकते हैं स्लम एरिया में रहने लगीं. यह विवाह अधिक दिनों तक न चल सका और कल्पना वापस गाँव आ गईं. परिस्थितियां भयावह थीं, कल्पना शारीरिक और मानसिक रूप से टूट रही थीं, गाँव और समाज ने उन्हें बहिष्कृत कर दिया. इस दबाव को झेल पाना कल्पना के लिए मुश्किल होता गया और एक दिन उन्होंने आत्महत्या करने तक की कोशिश कर डाली. एक असफल विवाह और समाज की प्रताड़नाओं ने उन्हें तोड़ कर रख दिया. डूबते को तिनके के सहारे के रूप में उन्हें अपने पिता का सहारा अवश्य मिला.

16 वर्ष की उम्र में कल्पना की मुंबई में दोबारा वापसी हुई, इस बार वो अपने एक रिश्तेदार के यहाँ रहीं और एक गारमेंट फैक्ट्री में सिलाई का काम करने लगीं. कल्पना की कल्पना की उड़ान लम्बी थी और नियति तो उनके लिए कुछ और ही निश्चित कर रखा था, अतः कल्पना ने स्वरोजगार की चाहत में अपनी जानकारी को आगे बढ़ाना शुरू किया. उन्होंने दलित एवं पिछड़ों को मिलने वाले सरकारी अनुदानों के विषय में जानकारी एकत्र की और जल्द ही एक इसी प्रकार के अनुदान से अपनी सिलाई की दुकान खोल ली. अपनी मेहनत, धैर्य और दूर दृष्टि के बल पर वो आगे बढ़ती रहीं और इस बार उन्होंने फिर पलटकर नहीं देखा. डिजाईन एवं क्रिएटिविटी की ओर रुझान होने के कारण उन्होंने जल्द ही फर्नीचर व्यवसाय में कदम बढ़ा दिया.

बहुत ही पिछड़ी पृष्ठभूमि से उद्यमिता के क्षेत्र में आई कल्पना सरोज की कुछ आदतों ने उन्हें आगे बढ़ने में बहुत मदद की. उनकी शक्तिशाली नेटवर्किंग, ज्ञान साझा करने की आदत और दूसरों की मदद के लिए तत्परता ने उन्हें लोकप्रिय और सफल बनाया. अपने शुरुआती दौर में उन्हें जब लोन इत्यादि लेने की प्रक्रिया समझ में आ गई, तो उन्होंने और लोगों एवं महिलाओं को भी स्वरोजगार के लिए प्रेरित करना शुरू कर दिया. इस प्रकार धीरे धीरे उनकी इमेज एक समाजसेवी के रूप में स्थापित होती चली गई. उन्होंने पिछड़ों, आदिवासियों, बच्चों, बुजुर्गों एवं दुर्बलों के लिये बहुत काम किया.

यह उनकी लोकप्रियता का ही असर था कि एक दिन 17 साल से बंद पड़ी फैक्ट्री की मजदूर यूनियन उन तक पहुँच जाती है और उनसे गुहार लगाती है कि आप इस बंद पड़ चुकी फैक्ट्री की कमान अपने हाँथ में लो और हम सब मिलकर यह फैक्ट्री दोबारा खड़ी करेंगे. यह बंद पड़ चुकी फैक्ट्री थी (Kamani Tubes Limited) कामानी ट्यूब्स लिमिटेड. पहले तो वो इसके लिए तैय्यार नहीं हुईं, लेकिन बाद में उन्हें यह महसूस हुआ कि इतने मजदूरों की रोजी रोटी का सवाल है, तो अंततः वे मान गईं. दो दशकों से बंद पड़ी हुई फैक्ट्री को वापस खड़ा करना अपने आप में ही एक बड़ी जंग थी.

2006 में कल्पना सरोज ने कामानी ट्यूब्स लिमिटेड को टेकओवर किया. 1960 में स्थापित यह कम्पनी 1985 से बंद पड़ी हुई थी. इस बंद इकाई के पास 3000 टन प्रति वर्ष कॉपर एलाय ट्यूब्स, 3200 टन प्रति कॉपर एलाय रॉड्स एवं सेक्शंस के विनिर्माण अथवा मैन्यूफैक्चरिंग का एक पूरा प्लांट मुंबई के कुर्ला इलाके में मौजूद था. कमानी ट्यूब्स को वापस खड़ा करने की यह कहानी भी अपने आप में बहुत इंटरेस्टिंग है. सितम्बर 1985 में यह इकाई बंद हो गई, मजदूर कोर्ट गए और सितम्बर 1987 में सुप्रीम कोर्ट ने दखल देकर इस इकाई को खुलवाया. इसे चलाने के लिए मजदूर एवं कामगार यूनियन को एक सोसाइटी बनाकर काम शुरू करने की हिदायत दी गई. बी.एफ.आई.आर. द्वारा सितम्बर 1988 में इस इकाई को रिहैबिलेशन स्कीम के अंतर्गत उबारने की मंजूरी प्रदान की गई. आई.डी.बी.आई. बैंक को स्कीम मुहैय्या कराने हेतु मोनिटरिंग एजेंसी नियुक्त किया गया. लेकिन कामानी बोर्ड एवं अन्य पक्षकारों के सभी हितधारकों के मध्य आम सहमति न बन सकी और मई 1995 में स्कीम रद्द घोषित कर दी गई. 2006 में केटीएल को एक सिक यूनिट के रूप में कल्पना सरोज ने टेकओवर किया.

नए मैनेजमेंट ने सबसे पहले वर्तमान कर्ज और देनदारिओं को निपटाया और फिर वाडा में स्टेटऑफ़आर्ट तकनीकि से युक्त विनिर्माण ढांचा खड़ा किया. इस प्रकार के अधिकतर मामलों में मुकदमेबाजी की टेढ़ी प्रक्रिया बड़े बड़े उद्यमिओं एवं मजदूर यूनियनों को तोड़ के रख देती है. कल्पना सरोज ने धैर्य के साथ धीरे धीरे सभी मुकदमों को निपटाया और केटीएल को वापस लाभ की स्थिति में लेकर आईं. इस प्रकार जहाँ बड़े बड़े उद्यमिता विशेषज्ञ फेल हो चुके थे, वहाँ एक दलित महिला ने अपना लोहा मनवाया.

कामानी ट्यूब्स लिमिटेड के इस सफल रिहैबिलेशन ने पद्मश्री कल्पना सरोज को बुलंदिओं पर पहुँचा दिया और वे एक जीती जागती उद्यमिता की मिसाल बन गईं. मजदूरों के संघर्ष की ऐसी सफल कहानियाँ भारतीय उद्यमिता जगत में तो मुश्किल से ही मिलेंगी, लेकिन मजदूरों के इस विश्वास को कल्पना ने सिर्फ कल्पना में ही नहीं बल्कि यथार्थ में सत्य सिद्ध किया. 2013 में कल्पना सरोज को पद्मश्री सम्मान से नवाजा गया, कोई बैंकिंग बैकग्राउंड न होने के बावजूद उन्हें भारतीय महिला बैंक के बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स में रखा गया. सामाजिक उत्थान के प्रति उनके कार्य आज भी जारी हैं और उद्यमिता की यह प्रेरणा आज भी बहुतों को प्रेरित कर रही है. उनकी कहानी शायद ही कोई समाचार चैनल होगा जिस पर दिखाई न जा चुकी हो. डिस्कवरी इत्यादि चैनल्स पर भी उनकी संघर्ष गाथा कई बार दिखाई जा चुकी है.

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कैसी लगी आपको उद्यमिता की मिसाल कल्पना सरोज जी की यह कहानीहमें अवश्य लिखें. आप सूक्ष्मलघु एवं मध्यम उद्यमिओं के इस पोर्टल SMEsamadhan.com और क्या पढ़ना चाहते हैंवह भी हमें लिखें.

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